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Hindi News ›   Himachal Pradesh ›   Kangra News ›   Plastic snatched away the baskets, iron replaced the poles... the era of bamboo began to wane in the mountains.

Kangra News: प्लास्टिक ने छीनी टोकरी, लोहे ने बल्लियां... पहाड़ों में ढलने लगा बांस का दौर

Fri, 18 Sep 2026 01:13 AM IST
Shimla Bureau शिमला ब्यूरो
Updated Fri, 18 Sep 2026 01:13 AM IST
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Plastic snatched away the baskets, iron replaced the poles... the era of bamboo began to wane in the mountains.
ढुगियारी में बांस से बबली ने तैयार की टोकरी और अन्य सामान। अमर उजाला
विश्व बांस दिवस आज : कभी घर की छत से लेकर हर जरूरत का साथी था बांस, अब पारंपरिक आयोजनों तक सिमट रहा इस्तेमाल
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सचिन चौधरी
धर्मशाला। कभी पहाड़ के ग्रामीण जीवन का अभिन्न हिस्सा रहा बांस अब आधुनिकता की दौड़ में अपनी जमीन खोता जा रहा है। पक्के मकानों ने कच्चे घरों की जगह ली तो बांस की छतें भी अतीत का हिस्सा बन गईं।
प्लास्टिक के सस्ते और आसानी से उपलब्ध सामान ने टोकरियों, टोकरों और घरेलू बर्तनों का बाजार छीन लिया। मकान निर्माण में लेंटल डालते समय शटरिंग को सहारा देने वाली बांस की बल्लियों की जगह भी अब लोहे के पाइप ने ले ली है।
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इससे बांस का पारंपरिक ही नहीं, निर्माण क्षेत्र में होने वाला इस्तेमाल भी लगातार घट रहा है। 18 सितंबर को विश्व बांस दिवस के मौके पर बांस के बदलते स्वरूप पर नजर डालें तो आधुनिक निर्माण तकनीक और प्लास्टिक के बढ़ते इस्तेमाल का असर साफ दिखाई देता है।
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एक दौर में गांवों में बांस के बिना घर और घरेलू जरूरतों की कल्पना मुश्किल थी। कच्चे मकानों की छत के ढांचे से लेकर टोकरियों, डलियों और खेती के उपकरणों तक बांस का इस्तेमाल आम था। अब पारंपरिक आयोजनों तक ही बांस के उत्पाद सिमट गए हैं।
पीढ़ियों का हुनर भी सिमट रहा
बांस का इस्तेमाल कम होने का असर केवल इस प्राकृतिक संसाधन तक सीमित नहीं है। इससे जुड़े पारंपरिक हुनर पर भी संकट गहराया है। बांस को काटकर जरूरत के मुताबिक सामान तैयार करने की कला कभी ग्रामीण परिवारों की रोजी-रोटी का जरिया थी। मांग घटने के साथ नई पीढ़ी भी इस काम से दूर होती जा रही है। कई कारीगर अब पारंपरिक काम छोड़ने के लिए मजबूर हैं।
बदलती जीवनशैली और प्लास्टिक व आधुनिक उत्पादों के बढ़ते चलन से बांस के सामान की मांग पहले की तुलना में काफी कम हो गई है। पहले शादी सहित अन्य समारोहों के लिए लोग महीनों पहले बांस के सामान की बुकिंग करवाते थे। धीरे-धीरे यह चलन भी कम होता गया। -बबली देवी, कारीगर, ढुगियारी
पक्के मकानों, आधुनिक निर्माण तकनीक और प्लास्टिक के बढ़ते इस्तेमाल ने बांस के पारंपरिक उपयोग को काफी सीमित कर दिया है। पहले छत डालने के लिए शटरिंग में बांस की बल्लियों का इस्तेमाल होता था लेकिन अब उनकी जगह लोहे के पाइप ने ले ली है। इससे निर्माण क्षेत्र में भी बांस की मांग काफी कम हुई है। -बृज मोहन, ठेकेदार, पास्सु
आर्टिफिशियल बर्तनों ने खत्म किया कारोबार
नंदेहड़ निवासी कारोबारी सुमन के अनुसार पहले पशुपालन अधिक होने के कारण बांस की टोकरियों की मांग रहती थी। विवाह-शादियों और धार्मिक व पारंपरिक आयोजनों में बांस के बर्तनों का इस्तेमाल शुभ माना जाता था। अब आर्टिफिशियल बर्तनों का चलन बढ़ने से पारंपरिक कारोबार प्रभावित हुआ है। इस काम में अब परिवार का गुजारा करना भी मुश्किल हो गया है और उम्र के इस पड़ाव में नया काम सीखना भी आसान नहीं है।
खेती के उपकरणों में भी घटा इस्तेमाल
पास्सु निवासी कारीगर किशोरी लाल बताते हैं कि कच्चे घरों के दौर में छत बनाने में बांस का काफी इस्तेमाल होता था और इसकी मांग भी रहती थी। खेती के उपकरण तैयार करने में भी बांस का इस्तेमाल किया जाता था। बदलते दौर में बांस का काम अब काफी सीमित रह गया है।

ढुगियारी में बांस से बबली ने तैयार की टोकरी और अन्य सामान। अमर उजाला

ढुगियारी में बांस से बबली ने तैयार की टोकरी और अन्य सामान। अमर उजाला

ढुगियारी में बांस से बबली ने तैयार की टोकरी और अन्य सामान। अमर उजाला

ढुगियारी में बांस से बबली ने तैयार की टोकरी और अन्य सामान। अमर उजाला

ढुगियारी में बांस से बबली ने तैयार की टोकरी और अन्य सामान। अमर उजाला

ढुगियारी में बांस से बबली ने तैयार की टोकरी और अन्य सामान। अमर उजाला

ढुगियारी में बांस से बबली ने तैयार की टोकरी और अन्य सामान। अमर उजाला

ढुगियारी में बांस से बबली ने तैयार की टोकरी और अन्य सामान। अमर उजाला

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