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दशराज युद्ध को यूरोपीय दृष्टि से देखा वास्तविकता से भटका विमर्श : प्रो. झा
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धर्मशाला। यूरोपीय चिंतकों ने भारतीय इतिहास और वेदों की घटनाओं की अपने दृष्टिकोण से व्याख्या कर भारतीय विमर्श को भटकाया है।
उन्होंने दशराज युद्ध जैसे ऐतिहासिक प्रसंग को ट्राइबल संघर्ष बताकर उसे आर्य-अनार्य या दास बनाम ब्राह्मण-क्षत्रिय संघर्ष के रूप में गलत ढंग से प्रस्तुत किया।
यह बात जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) के स्कूल ऑफ संस्कृत एंड इंडिक स्टडीज के आचार्य प्रो. राम नाथ झा ने कही। वे सप्त सिंधु फाउंडेशन न्यास द्वारा आयोजित एक ऑनलाइन व्याख्यान को संबोधित कर रहे थे।
‘बैटल ऑफ टेन किंग्स इन रिग्वेदा : आईडेंटिफाइंग पार्टिसिपेटिंग कम्युनिटीज’ विषय पर अपने व्याख्यान में प्रो. झा ने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा में संसार को दैवीय और आसुरी शक्तियों के संघर्ष के रूप में देखा गया है।
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उन्होंने कहा कि वैदिक काल में रावी नदी के तट पर हुआ दशराज युद्ध भी इसी टकराव का प्रतीक था और यह टकराव आज भी विभिन्न रूपों में विश्व मंच पर जारी है, चाहे वह भारत-पाक संघर्ष हो या वैश्विक युद्ध।
वेदों को समझने के लिए उनके रचियता ऋषियों की अंतर्दृष्टि को समझना जरूरी है, जबकि यूरोपीय चिंतक किसी भी विषय को अपनी अवधारणाओं के अनुसार समझने का आग्रह करते हैं।
इसी कारण भारतीय ग्रंथों की कई अवधारणाओं की दुर्व्याख्या हुई है, जिसे बाद में भारत के वामपंथी चिंतकों ने भी आगे बढ़ाया।
प्रो. झा ने यह भी कहा कि भारतीय ग्रंथों को भारतीय संदर्भों और दर्शन के अनुसार ही समझा और प्रस्तुत किया जाना चाहिए, ताकि मूल ज्ञान परंपरा की गरिमा बनी रहे।
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उन्होंने दशराज युद्ध जैसे ऐतिहासिक प्रसंग को ट्राइबल संघर्ष बताकर उसे आर्य-अनार्य या दास बनाम ब्राह्मण-क्षत्रिय संघर्ष के रूप में गलत ढंग से प्रस्तुत किया।
यह बात जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) के स्कूल ऑफ संस्कृत एंड इंडिक स्टडीज के आचार्य प्रो. राम नाथ झा ने कही। वे सप्त सिंधु फाउंडेशन न्यास द्वारा आयोजित एक ऑनलाइन व्याख्यान को संबोधित कर रहे थे।
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‘बैटल ऑफ टेन किंग्स इन रिग्वेदा : आईडेंटिफाइंग पार्टिसिपेटिंग कम्युनिटीज’ विषय पर अपने व्याख्यान में प्रो. झा ने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा में संसार को दैवीय और आसुरी शक्तियों के संघर्ष के रूप में देखा गया है।
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उन्होंने कहा कि वैदिक काल में रावी नदी के तट पर हुआ दशराज युद्ध भी इसी टकराव का प्रतीक था और यह टकराव आज भी विभिन्न रूपों में विश्व मंच पर जारी है, चाहे वह भारत-पाक संघर्ष हो या वैश्विक युद्ध।
वेदों को समझने के लिए उनके रचियता ऋषियों की अंतर्दृष्टि को समझना जरूरी है, जबकि यूरोपीय चिंतक किसी भी विषय को अपनी अवधारणाओं के अनुसार समझने का आग्रह करते हैं।
इसी कारण भारतीय ग्रंथों की कई अवधारणाओं की दुर्व्याख्या हुई है, जिसे बाद में भारत के वामपंथी चिंतकों ने भी आगे बढ़ाया।
प्रो. झा ने यह भी कहा कि भारतीय ग्रंथों को भारतीय संदर्भों और दर्शन के अनुसार ही समझा और प्रस्तुत किया जाना चाहिए, ताकि मूल ज्ञान परंपरा की गरिमा बनी रहे।