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Kangra News: पहले नाम से जाने जाते थे धान, अब नंबर बने पहचान

Wed, 30 Sep 2026 07:36 AM IST
Shimla Bureau शिमला ब्यूरो
Updated Wed, 30 Sep 2026 07:36 AM IST
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Paddy varieties were once known by their names; now, numbers have become their identity.
पासू के खेतों में लगाई गई हाईब्रिड धान 111 की किस्म। अमर उजाला
धर्मशाला। कभी धान की समृद्ध किस्में अपने खास स्थानीय नामों और खुशबू से पहचानी जाती थीं। किसान अपनी ही बेहतरीन फसल की स्वस्थ बालियों को चुनकर अगले साल के लिए घर पर ही उत्तम बीज तैयार कर लेते थे। एक बार सुरक्षित रखा गया बीज कई वर्षों तक पीढ़ी-दर-पीढ़ी फसल देता रहता था।
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अब खेती का यह पारंपरिक चक्र तेजी से टूट चुका है। कांगड़ा के खेतों में देसी धान की पारंपरिक किस्मों की जगह हाइब्रिड वैरायटियों ने ले ली है। बाजार में मिलने वाले धान की पहचान अब नाम के बजाय कोड नंबरों से होने लगी है।
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हाइब्रिड धान की ओर रुझान बढ़ने से किसानों की आत्मनिर्भरता खत्म हो रही है और निजी बीज कंपनियों व बाजार पर निर्भरता लगातार बढ़ रही है। हाइब्रिड बीजों से तैयार फसल से किसान अगली बुवाई के लिए बीज तैयार नहीं कर पाते, क्योंकि दोबारा इस्तेमाल करने पर फसल में वह गुणवत्ता और उत्पादन नहीं मिलता। नतीजतन, हर खरीफ सीजन में नया और महंगा बीज खरीदना किसानों की मजबूरी बन चुका है, जिससे खेती की शुरुआती लागत में भारी इजाफा हो रहा है।
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पहले कांगड़ा घाटी के गांवों में झुमका, झिणी, परमल, लाल चावल और बासमती जैसी पारंपरिक देसी किस्में प्रमुखता से लहलहाती थीं। ये किस्में लाजवाब स्वाद, भीनी खुशबू, पकने की समयावधि और स्थानीय जलवायु के अनुकूल होने के कारण अलग पहचान रखती थीं। उत्पादन की होड़ और पारंपरिक बीजों के संरक्षण के अभाव में ये समृद्ध किस्में खेतों से लगभग गायब हो चुकी हैं। नई पीढ़ी इन पुरानी किस्मों के नामों तक से अनजान होती जा रही है।
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उत्पादन की चाह में बढ़ा खर्च, बीज बैंक की दरकार
किसानों के अनुसार हाइब्रिड किस्में कम समय में तैयार होने और अधिक पैदावार देने के कारण तेजी से लोकप्रिय हुईं। मगर हर साल प्रमाणित बीज खरीदने, उसके परिवहन और रासायनिक खादों के इस्तेमाल से खेती का कुल बजट बिगड़ गया है। जानकारों का मानना है कि पारंपरिक किस्मों के संरक्षण और स्थानीय स्तर पर बीज बैंक विकसित करने की सख्त जरूरत है।

जिले में करीब 28,782 हेक्टेयर भूमि पर धान की खेती की जाती है। अब किसान बड़े पैमाने पर हाइब्रिड बीजों का रुख कर रहे हैं। विभाग की ओर से इस बार स्टार-795 हाइब्रिड धान किसानों को उपलब्ध करवाया गया था। इसके अलावा निजी बीज भंडारों में 100, 111, 5632 जैसी कई अन्य नंबर वाली वैरायटियां बिक रही हैं। हाइब्रिड धान से अगली फसल के लिए बीज तैयार नहीं होता, इसलिए किसानों को हर बार बाजार से नया बीज खरीदना पड़ता है। -डॉ. अशोक कुमार, उपनिदेशक, कृषि विभाग, कांगड़ा
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