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Kangra News: पांच पंचायतों में धान की फसल ब्लैक स्ट्रिक्ड ड्वार्फ वायरस की चपेट में

Fri, 21 Aug 2026 04:03 AM IST
Shimla Bureau शिमला ब्यूरो
Updated Fri, 21 Aug 2026 04:03 AM IST
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Paddy crops in five panchayats hit by Black Streaked Dwarf Virus.
सदरपुर और कोहाला में धान के खेतों का निरिक्षण करते कृषि विभाग के अधिकारी। -विभाग
धर्मशाला। कृषि खंड कांगड़ा की पांच पंचायतों सदरपुर, कोहाला, कोली, राजियाणा और 53 मील में धान की फसल में साउदर्न राइस ब्लैक-स्ट्रीक्ड ड्वार्फ वायरस से बौनेपन का खतरा बढ़ रहा है। इस रोग के कारण पौधे अपनी सामान्य लंबाई हासिल नहीं कर पा रहे हैं।
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एहतियात के तौर पर कृषि विभाग और कृषि विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों की संयुक्त टीम ने इन पंचायतों में फसल का निरीक्षण किया। विशेषज्ञों ने किसानों को बताया कि वायरस की कोई दवा नहीं है, इसकी रोकथाम ही उपाय है। उन्होंने किसानों को संक्रमित पौधों को खेत से निकालने, फसल की नियमित निगरानी करने और लाइट ट्रैप लगाने की सलाह दी।
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इस दौरान कृषि विश्वविद्यालय पालमपुर के वैज्ञानिक डॉ. डीपी पांडेय ने किसानों को रोगों की समय पर पहचान, रोकथाम और अनुमोदित दवाइयों का उचित मात्रा में प्रयोग करने की जानकारी दी। उन्होंने कहा कि साउदर्न राइस ब्लैक स्ट्रिक्ड ड्वार्फ वायरस सफेद पीठ वाले फुदका प्रजाति के कीटों से फैलता है और इससे पौधों में बौनापन आ जाता है। समय रहते रोकथाम न की गई तो किसानों को पैदावार में भारी नुकसान का सामना करना पड़ सकता है।
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टीम में राज्य जैव नियंत्रण प्रयोगशाला पालमपुर, कृषि विश्वविद्यालय पालमपुर और कृषि विभाग कांगड़ा के विशेषज्ञ शामिल रहे। इस दौरान जैव नियंत्रण प्रयोगशाला के विशेषज्ञों ने जैविक कीटनाशकों, फसल चक्र और सामूहिक कीट प्रबंधन अपनाने पर जोर दिया। किसानों से विभाग की ओर से आयोजित प्रशिक्षण कार्यक्रमों में सक्रिय भागीदारी करने का आग्रह किया गया।
इस मौके पर विषयवाद विशेषज्ञ कांगड़ा डॉ. रूपिका शर्मा, कृषि विकास अधिकारी डॉ. रीता ठाकुर, डॉ. मंजु, डॉ. इंदु राणा और डॉ. काजल मौजूद रहे।
धान के पौधे बौने रहने की सबसे बड़ी वजह ‘साउदर्न राइस ब्लैक-स्ट्रीक्ड ड्वार्फ वायरस’ और जिंक की कमी है। जब सफेद पीठ वाला या भूरा फुदका संक्रमित पौधे का रस चूसकर स्वस्थ पौधे पर बैठता है तो यह वायरस फैल जाता है। इसके अलावा जल भराव, जड़ों का खराब विकास और असंतुलित यूरिया का प्रयोग भी पौधों का विकास रोक देता है, जिससे तना सख्त और छोटा रह जाता है।
खेत में बौनेपन के प्रमुख लक्षण

बीमारी से प्रभावित पौधे खेत में दूर से ही छोटे और गुच्छेदार दिखाई देते हैं। इनकी पत्तियां सामान्य पत्तियों की तुलना में अधिक गहरी हरी, मोटी और कभी-कभी मुड़ी हुई होती हैं। प्रभावित पौधों की जड़ों का विकास रुक जाता है और उनमें जड़ें नहीं निकलतीं। सबसे चिंताजनक बात यह है कि इन बौने पौधों में या तो बालियां निकलती ही नहीं, और यदि निकलती भी हैं तो वे पूरी तरह खाली और खोखली रह जाती हैं.

रोकथाम और नियंत्रण के प्रभावी उपाय

इस समस्या से निपटने के लिए सबसे पहले रसचूसक कीटों का सफाया जरूरी है. इसके लिए खेत में इमिडाक्लोप्रिड या ट्राइफ्लूमेज़ोपिरिम का छिड़काव एक्सपर्ट की सलाह पर करें। यदि समस्या जिंक की कमी से है, तो प्रति एकड़ 0.5% जिंक सल्फेट और 1% यूरिया का घोल बनाकर पत्तियों पर छिड़कें। खेत में पानी को रुकने न दें और बारी-बारी से सुखाकर ही सिंचाई करें।
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