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खास खबर ::::::: नेत्रदान घटा तो बढ़ा अंधेरे का इंतजार
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आई
धर्मशाला। कोरोना महामारी के बाद जनजीवन तो पटरी पर लौट आया लेकिन नेत्रदान जैसे पुनीत सामाजिक अभियान की गति धीमी पड़ गई है। नेत्रदान में आई भारी कमी के चलते कॉर्निया प्रत्यारोपण के लिए मरीजों को लंबा इंतजार करना पड़ रहा है। वर्तमान में इंदिरा गांधी मेडिकल कॉलेज (आईजीएमसी) एवं अस्पताल शिमला के आई बैंक में ही करीब 140 मरीज आंखों की रोशनी लौटने की उम्मीद में कतार में हैं।
आंकड़ों के अनुसार, कोरोना काल से पहले देश में प्रतिवर्ष लगभग 50 से 60 हजार लोग नेत्रदान करते थे, जो अब घटकर मात्र 20 से 25 हजार रह गया है। देश में करीब 40 लाख दृष्टिहीन लोगों को आंखों की आवश्यकता है।
पांच प्रतिशत दान से भी दूर हो सकती है कमी
आईजीएमसी शिमला के नेत्र विभागाध्यक्ष डॉ. राम लाल शर्मा ने बताया कि अस्पतालों में जिन मरीजों की मृत्यु होती है यदि उनके परिजनों में से मात्र पांच प्रतिशत लोग भी स्वेच्छा से नेत्रदान करें तो इस कमी को आसानी से पूरा किया जा सकता है। उन्होंने लोगों से अपील की है कि मृत्यु के उपरांत परिजनों की सहमति से समय रहते आई बैंक को सूचना देकर जरूरतमंदों के जीवन को रोशन करने में आगे आएं।
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एक आंख, तीन को रोशनी: आधुनिक चिकित्सा विज्ञान की प्रगति से अब एक स्वस्थ आंख का उपयोग तीन अलग-अलग मरीजों के इलाज में किया जा सकता है।
केवल कॉर्निया का उपयोग: नेत्रदान में पूरी आंख निकालने के बजाय मुख्य रूप से कॉर्निया का प्रत्यारोपण किया जाता है।
भ्रांतियों को दूर करना जरूरी: विशेषज्ञों के अनुसार अधिक उम्र, चश्मा लगाना या पूर्व में हुआ मोतियाबिंद का ऑपरेशन नेत्रदान में कोई बाधा नहीं बनता है।
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आंकड़ों के अनुसार, कोरोना काल से पहले देश में प्रतिवर्ष लगभग 50 से 60 हजार लोग नेत्रदान करते थे, जो अब घटकर मात्र 20 से 25 हजार रह गया है। देश में करीब 40 लाख दृष्टिहीन लोगों को आंखों की आवश्यकता है।
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पांच प्रतिशत दान से भी दूर हो सकती है कमी
आईजीएमसी शिमला के नेत्र विभागाध्यक्ष डॉ. राम लाल शर्मा ने बताया कि अस्पतालों में जिन मरीजों की मृत्यु होती है यदि उनके परिजनों में से मात्र पांच प्रतिशत लोग भी स्वेच्छा से नेत्रदान करें तो इस कमी को आसानी से पूरा किया जा सकता है। उन्होंने लोगों से अपील की है कि मृत्यु के उपरांत परिजनों की सहमति से समय रहते आई बैंक को सूचना देकर जरूरतमंदों के जीवन को रोशन करने में आगे आएं।
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एक आंख, तीन को रोशनी: आधुनिक चिकित्सा विज्ञान की प्रगति से अब एक स्वस्थ आंख का उपयोग तीन अलग-अलग मरीजों के इलाज में किया जा सकता है।
केवल कॉर्निया का उपयोग: नेत्रदान में पूरी आंख निकालने के बजाय मुख्य रूप से कॉर्निया का प्रत्यारोपण किया जाता है।
भ्रांतियों को दूर करना जरूरी: विशेषज्ञों के अनुसार अधिक उम्र, चश्मा लगाना या पूर्व में हुआ मोतियाबिंद का ऑपरेशन नेत्रदान में कोई बाधा नहीं बनता है।