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Kangra News: चेक बाउंस मामले में दोषी को दो साल की कैद, 3.05 लाख जुर्माना
Tue, 22 Sep 2026 07:11 AM IST
शिमला ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, कांगड़ा
संवाद न्यूज एजेंसी, कांगड़ा
Updated Tue, 22 Sep 2026 07:11 AM IST
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धर्मशाला। न्यायिक दंडाधिकारी प्रथम श्रेणी-द्वितीय डॉ. पार्थ जैन की अदालत ने 1.85 लाख रुपये के चेक बाउंस मामले में आरोपी को दोषी करार दिया है। अदालत ने परक्राम्य लिखत अधिनियम (एनआई एक्ट) की धारा 138 के तहत दोषी को दो साल के साधारण कारावास की सजा सुनाई। अदालत ने 3.05 लाख रुपये का जुर्माना लगाया है, जो शिकायतकर्ता अधिवक्ता को मुआवजे के तौर पर दिया जाएगा।
जुर्माना न भरने की स्थिति में दोषी को छह माह का अतिरिक्त कारावास भुगतना होगा। शिकायतकर्ता अधिवक्ता अमित कुमार शर्मा के अनुसार पालमपुर के भरमात क्षेत्र के आरोपी ने नौ चेक बाउंस मामलों, समझौतों के निपटारे और कानूनी सलाह के लिए उनकी सेवाएं ली थीं। पेशेवर फीस और खर्च के एवज में 1.85 लाख रुपये की देनदारी तय हुई थी।
इसके भुगतान के लिए आरोपी ने 15 अप्रैल 2021 का चेक दिया, जो 30 जून 2021 को खाते में पर्याप्त राशि न होने के कारण बाउंस हो गया। तय अवधि में कानूनी नोटिस का जवाब और भुगतान न मिलने पर मामला अदालत पहुंचा। सुनवाई के दौरान आरोपी ने कानूनी सेवाएं लेने की बात तो मानी, लेकिन दावा किया कि वह हर पेशी की फीस नकद देता था।
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आरोपी ने यह दलील भी दी कि संबंधित चेक उसने बैंक ऋण के दौरान सुरक्षा के तौर पर दिया था, जिसे शिकायतकर्ता ने बैंक का स्थायी अधिवक्ता होने के नाते हासिल कर लिया। अदालत ने पर्याप्त साक्ष्य न होने के कारण आरोपी के इस तर्क को खारिज कर दिया। अदालत ने पाया कि शिकायतकर्ता के गवाहों ने आरोपी को कार्यालय में फीस तय करने और चेक सौंपते हुए देखा था।
दूसरी ओर, आरोपी बैंक रिकॉर्ड या किसी अधिकारी की गवाही से यह साबित करने में पूरी तरह नाकाम रहा कि चेक बैंक के पास सुरक्षा के तौर पर जमा था। सभी साक्ष्यों व तथ्यों के आधार पर अदालत ने आरोपी को दोषी ठहराते हुए सजा सुनाई।
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जुर्माना न भरने की स्थिति में दोषी को छह माह का अतिरिक्त कारावास भुगतना होगा। शिकायतकर्ता अधिवक्ता अमित कुमार शर्मा के अनुसार पालमपुर के भरमात क्षेत्र के आरोपी ने नौ चेक बाउंस मामलों, समझौतों के निपटारे और कानूनी सलाह के लिए उनकी सेवाएं ली थीं। पेशेवर फीस और खर्च के एवज में 1.85 लाख रुपये की देनदारी तय हुई थी।
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इसके भुगतान के लिए आरोपी ने 15 अप्रैल 2021 का चेक दिया, जो 30 जून 2021 को खाते में पर्याप्त राशि न होने के कारण बाउंस हो गया। तय अवधि में कानूनी नोटिस का जवाब और भुगतान न मिलने पर मामला अदालत पहुंचा। सुनवाई के दौरान आरोपी ने कानूनी सेवाएं लेने की बात तो मानी, लेकिन दावा किया कि वह हर पेशी की फीस नकद देता था।
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आरोपी ने यह दलील भी दी कि संबंधित चेक उसने बैंक ऋण के दौरान सुरक्षा के तौर पर दिया था, जिसे शिकायतकर्ता ने बैंक का स्थायी अधिवक्ता होने के नाते हासिल कर लिया। अदालत ने पर्याप्त साक्ष्य न होने के कारण आरोपी के इस तर्क को खारिज कर दिया। अदालत ने पाया कि शिकायतकर्ता के गवाहों ने आरोपी को कार्यालय में फीस तय करने और चेक सौंपते हुए देखा था।
दूसरी ओर, आरोपी बैंक रिकॉर्ड या किसी अधिकारी की गवाही से यह साबित करने में पूरी तरह नाकाम रहा कि चेक बैंक के पास सुरक्षा के तौर पर जमा था। सभी साक्ष्यों व तथ्यों के आधार पर अदालत ने आरोपी को दोषी ठहराते हुए सजा सुनाई।