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Kangra News: अपील खारिज, 18 महीने की कैद और चार लाख रुपये जुर्माने की सजा बरकरार
Sun, 03 May 2026 06:03 AM IST
शिमला ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, कांगड़ा
संवाद न्यूज एजेंसी, कांगड़ा
Updated Sun, 03 May 2026 06:03 AM IST
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धर्मशाला। जिला एवं सत्र न्यायाधीश चिराग भानु सिंह की अदालत ने चेक बाउंस के एक मामले में निचली अदालत (ट्रायल कोर्ट) के फैसले को बरकरार रखते हुए दोषी की अपील खारिज कर दी है। अदालत ने मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी द्वारा सुनाई गई एक वर्ष छह माह की कैद और चार लाख रुपये के भुगतान की सजा को उचित ठहराया है।
साथ ही संबंधित न्यायालय को निर्देश दिए हैं कि दोषी को सजा भुगतने के लिए तुरंत हिरासत में लिया जाए। जानकारी के अनुसार शाहपुर क्षेत्र के एक व्यक्ति ने स्थानीय ट्रेडर्स से 810 सीमेंट के बैग खरीदे थे। इसके भुगतान के लिए 3.70 लाख रुपये का चेक जारी किया गया था। जब शिकायतकर्ता ने चेक बैंक में लगाया, तो हस्ताक्षर मेल न खाने के कारण वह बाउंस हो गया।
कानूनी नोटिस भेजने के बावजूद भुगतान न होने पर मामला अदालत पहुंचा। निचली अदालत ने आरोपी को दोषी करार देते हुए सजा सुनाई थी, जिसके खिलाफ उसने सत्र न्यायालय में याचिका दायर की थी। अपील के दौरान आरोपी ने दलील दी कि उसने चेक सिक्योरिटी के रूप में दिया था और भुगतान नकद में कर दिया था।
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हालांकि, माननीय अदालत ने पाया कि आरोपी अपने इस दावे के पक्ष में कोई साक्ष्य पेश नहीं कर सका। अदालत ने स्पष्ट किया कि जब चेक जारी करना स्वीकार किया गया हो, तो कानूनन उसे वैध देनदारी ही माना जाता है। आरोपी इस धारणा को गलत साबित करने में नाकाम रहा, जिसके चलते उसकी याचिका खारिज कर दी गई।
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साथ ही संबंधित न्यायालय को निर्देश दिए हैं कि दोषी को सजा भुगतने के लिए तुरंत हिरासत में लिया जाए। जानकारी के अनुसार शाहपुर क्षेत्र के एक व्यक्ति ने स्थानीय ट्रेडर्स से 810 सीमेंट के बैग खरीदे थे। इसके भुगतान के लिए 3.70 लाख रुपये का चेक जारी किया गया था। जब शिकायतकर्ता ने चेक बैंक में लगाया, तो हस्ताक्षर मेल न खाने के कारण वह बाउंस हो गया।
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कानूनी नोटिस भेजने के बावजूद भुगतान न होने पर मामला अदालत पहुंचा। निचली अदालत ने आरोपी को दोषी करार देते हुए सजा सुनाई थी, जिसके खिलाफ उसने सत्र न्यायालय में याचिका दायर की थी। अपील के दौरान आरोपी ने दलील दी कि उसने चेक सिक्योरिटी के रूप में दिया था और भुगतान नकद में कर दिया था।
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हालांकि, माननीय अदालत ने पाया कि आरोपी अपने इस दावे के पक्ष में कोई साक्ष्य पेश नहीं कर सका। अदालत ने स्पष्ट किया कि जब चेक जारी करना स्वीकार किया गया हो, तो कानूनन उसे वैध देनदारी ही माना जाता है। आरोपी इस धारणा को गलत साबित करने में नाकाम रहा, जिसके चलते उसकी याचिका खारिज कर दी गई।