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सभ्यता और संस्कृति से भी बंधी हैं नदियां
Updated Sat, 25 Nov 2017 11:14 PM IST
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अमर उजाला ब्यूरो
धर्मशाला। भारतीय संस्कृति नदियों को एक जीवंत प्रणाली मानती है, जबकि आज की सभ्यता इन नदियों को सिर्फ पानी के उपभोग का संसाधन मानती है। देश और प्रदेशों की सरकारें भी सभ्यता के इसी रोग से पीड़ित हैं।
इस कारण देशभर में नदियों को अस्तित्व तेजी से सिकुड़ता जा रहा है। इससे हमारी संस्कृति और विकास दोनों खतरे में पड़ गए हैं। यह बात हिमाचल प्रदेश केंद्रीय विश्वविद्यालय धर्मशाला के धौलाधार परिसर में आयोजित सम्राट ललितादित्य व्याख्यानमाला के दौरान प्रख्यात पर्यावणविद् अरुण तिवारी ने कही। वे भारतीय संस्कृति में नदी विषय पर बोल रहे थे। उन्होंने कहा कि हमारी सभ्यता कितनी नदी विरोधी है। इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि आज जो शहर जितना विकसित है। उसके आसपास से बहने वाली नदी की हालत उतनी ही दयनीय है। दिल्ली और कोलकाता महानगर इसके दो बड़े प्रमाण हैं। उन्होंने कहा कि नदी को सिर्फ पानी का स्रोत मानना बहुत बड़ी भूल है। नदी एक जीवंत प्रणाली है और वह तभी जिंदा रह सकती है जब तक उसका प्रवाह बना रहे। उन्होंने वर्तमान पीढ़ी से आग्रह किया है कि वे प्रकृति से जितना लेते हैं, उतना लौटाने की भी कोशिश करें। नदी सहित पूरे पर्यावरण को बचाने का यही सबसे सीधा और सरल समाधान है। भारतीय संस्कृति पंचतत्वों को भगवान मानकर पूजा करती रही है। संस्कृति के इस भाव को नई पीढ़ी तक पहुंचाना आज के संदर्भ में जरूरी हो गया है। उन्होंने कहा कि जब तक प्रकृति की देखरेख का जिम्मा समाज के हाथों में था, तब तक देश में पर्यावरण की समस्या पैदा नहीं हुई थी। नदी और वन जैसे संसाधनों के सरकारों के हाथों के बाद ही स्थितियां बिगड़ी हैं। उन्होंने कहा कि आज बाढ़ और सूखे को लेकर हल्ला मचा रहता है, जबकि प्राकृतिक बाढ़ कभी भी बुरी नहीं होती। प्राकृतिक बाढ़ जमीन को उपजाऊ बनाती है। इस मौके पर व्याख्यानमाला के संयोजक डॉ. जेपी सिंह, प्रो. भजहरि दास, डॉ. कुलदीप शुक्ल, डॉ. विवेक कुमार शर्मा, शोधार्थी और विद्यार्थी मौजूद रहे।
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धर्मशाला। भारतीय संस्कृति नदियों को एक जीवंत प्रणाली मानती है, जबकि आज की सभ्यता इन नदियों को सिर्फ पानी के उपभोग का संसाधन मानती है। देश और प्रदेशों की सरकारें भी सभ्यता के इसी रोग से पीड़ित हैं।
इस कारण देशभर में नदियों को अस्तित्व तेजी से सिकुड़ता जा रहा है। इससे हमारी संस्कृति और विकास दोनों खतरे में पड़ गए हैं। यह बात हिमाचल प्रदेश केंद्रीय विश्वविद्यालय धर्मशाला के धौलाधार परिसर में आयोजित सम्राट ललितादित्य व्याख्यानमाला के दौरान प्रख्यात पर्यावणविद् अरुण तिवारी ने कही। वे भारतीय संस्कृति में नदी विषय पर बोल रहे थे। उन्होंने कहा कि हमारी सभ्यता कितनी नदी विरोधी है। इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि आज जो शहर जितना विकसित है। उसके आसपास से बहने वाली नदी की हालत उतनी ही दयनीय है। दिल्ली और कोलकाता महानगर इसके दो बड़े प्रमाण हैं। उन्होंने कहा कि नदी को सिर्फ पानी का स्रोत मानना बहुत बड़ी भूल है। नदी एक जीवंत प्रणाली है और वह तभी जिंदा रह सकती है जब तक उसका प्रवाह बना रहे। उन्होंने वर्तमान पीढ़ी से आग्रह किया है कि वे प्रकृति से जितना लेते हैं, उतना लौटाने की भी कोशिश करें। नदी सहित पूरे पर्यावरण को बचाने का यही सबसे सीधा और सरल समाधान है। भारतीय संस्कृति पंचतत्वों को भगवान मानकर पूजा करती रही है। संस्कृति के इस भाव को नई पीढ़ी तक पहुंचाना आज के संदर्भ में जरूरी हो गया है। उन्होंने कहा कि जब तक प्रकृति की देखरेख का जिम्मा समाज के हाथों में था, तब तक देश में पर्यावरण की समस्या पैदा नहीं हुई थी। नदी और वन जैसे संसाधनों के सरकारों के हाथों के बाद ही स्थितियां बिगड़ी हैं। उन्होंने कहा कि आज बाढ़ और सूखे को लेकर हल्ला मचा रहता है, जबकि प्राकृतिक बाढ़ कभी भी बुरी नहीं होती। प्राकृतिक बाढ़ जमीन को उपजाऊ बनाती है। इस मौके पर व्याख्यानमाला के संयोजक डॉ. जेपी सिंह, प्रो. भजहरि दास, डॉ. कुलदीप शुक्ल, डॉ. विवेक कुमार शर्मा, शोधार्थी और विद्यार्थी मौजूद रहे।
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