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Kangra News: जिले में जर्सी गायों के अब तक हुए 1.76 लाख कृत्रिम गर्भाधान
Sat, 19 Sep 2026 05:29 AM IST
शिमला ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, कांगड़ा
संवाद न्यूज एजेंसी, कांगड़ा
Updated Sat, 19 Sep 2026 05:29 AM IST
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धर्मशाला। जिले में पशुपालकों की आय बढ़ाने और डेयरी व्यवसाय को अधिक लाभकारी बनाने के उद्देश्य से राष्ट्रीय गोकुल मिशन के तहत जर्सी गायों के नस्ल सुधार का कार्य तेज गति से चल रहा है। राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड (एनडीडीबी) और हिमाचल प्रदेश पशुधन विकास बोर्ड के संयुक्त तत्वावधान में जिले भर में यह महत्वाकांक्षी योजना क्रियान्वित की जा रही है।
विभाग की ताजा रिपोर्ट के अनुसार, जिले में अब तक 1.76 लाख कृत्रिम गर्भाधान किए जा चुके हैं, जिनमें से 35 हजार इसी वर्ष हुए। इसके अलावा 18 हजार उच्च नस्ल की बछड़ियों का पंजीकरण किया गया है। 15 हजार गायों के दैनिक दुग्ध उत्पादन का रिकॉर्ड रखा जा रहा है।
पशु स्वास्थ्य सुरक्षा के तहत 22 हजार पशुओं को कृमिनाशक दवा पिलाई गई है और सात हजार बछड़ियों को ब्रुसेलोसिस का सुरक्षा टीका लगाया जा चुका है। वैज्ञानिक पशुपालन को बढ़ावा देने के लिए 1,425 किसानों को प्रशिक्षित किया गया है। योजना से अनुसूचित जाति व जनजाति वर्ग के 23 हजार पशुपालक जुड़ चुके हैं।
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यह योजना 2020 से 2026 तक निर्धारित थी जिसकी प्रारंभिक अवधि मार्च में पूर्ण हो गई थी। अब इसे पांच वर्षों के लिए और विस्तारित कर दिया गया है। नस्ल सुधार एक निरंतर प्रक्रिया है जिसका सकारात्मक परिणाम पीढ़ियों में दिखाई देता है। आने वाले समय में जब उन्नत नस्ल की गायें तैयार होंगी, तो पशुपालकों की आर्थिकी को बड़ा संबल मिलेगा। -डॉ. सीमा गुलेरिया, उपनिदेशक, पशुपालन विभाग कांगड़ा
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विभाग की ताजा रिपोर्ट के अनुसार, जिले में अब तक 1.76 लाख कृत्रिम गर्भाधान किए जा चुके हैं, जिनमें से 35 हजार इसी वर्ष हुए। इसके अलावा 18 हजार उच्च नस्ल की बछड़ियों का पंजीकरण किया गया है। 15 हजार गायों के दैनिक दुग्ध उत्पादन का रिकॉर्ड रखा जा रहा है।
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पशु स्वास्थ्य सुरक्षा के तहत 22 हजार पशुओं को कृमिनाशक दवा पिलाई गई है और सात हजार बछड़ियों को ब्रुसेलोसिस का सुरक्षा टीका लगाया जा चुका है। वैज्ञानिक पशुपालन को बढ़ावा देने के लिए 1,425 किसानों को प्रशिक्षित किया गया है। योजना से अनुसूचित जाति व जनजाति वर्ग के 23 हजार पशुपालक जुड़ चुके हैं।
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यह योजना 2020 से 2026 तक निर्धारित थी जिसकी प्रारंभिक अवधि मार्च में पूर्ण हो गई थी। अब इसे पांच वर्षों के लिए और विस्तारित कर दिया गया है। नस्ल सुधार एक निरंतर प्रक्रिया है जिसका सकारात्मक परिणाम पीढ़ियों में दिखाई देता है। आने वाले समय में जब उन्नत नस्ल की गायें तैयार होंगी, तो पशुपालकों की आर्थिकी को बड़ा संबल मिलेगा। -डॉ. सीमा गुलेरिया, उपनिदेशक, पशुपालन विभाग कांगड़ा