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मतदाताओं की अबूझ चुनावी पहेली में हर कोई उलझा

Sat, 11 Nov 2017 11:06 PM IST
Updated Sat, 11 Nov 2017 11:06 PM IST
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मतदाताओं की अबूझ चुनावी पहेली में हर कोई उलझा
रितेश महाजन
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नूरपुर (कांगड़ा)। चुनावी दंगल में मतदान के बाद अब चुनाव नतीजों को लेकर चौतरफा अटकलों का दौर शुरू हो गया है। किसने किस को वोट डाला, कहां किसे कितनी लीड मिलेगी और रिजल्ट क्या होगा? पोलिंग के बाद अब हर कोई मतदाताओं की इस अबूझ पहेली में उलझा हुआ है।

18 दिसंबर को होने वाली मतगणना से पहले ही प्रत्याशी अपने-अपने हिसाब से जीत का सियासी अंक गणित लगाने में जुट गए हैं। कयास लगाने वाले भी मतदाता के मन की टोह लेने में कामयाब नहीं हुए है और अब हार-जीत का फासला 19 और 21 होने का दम भर रहे हैं। नूरपुर हलके की बात करें तो पिछले विस चुनाव के मुकाबले मतदान प्रतिशतता (पोलिंग) में इस बार करीब एक फीसदी की मामूली गिरावट ने चुनावी समर में उतरे प्रत्याशियों की धुकधुकी को बढ़ा दिया है। हालांकि, पिछले चुनाव में कुल 72 हजार 585 में से 56 हजार 801 मतदाताओं की तुलना में इस बार कुल 82 हजार 260 मतदाताओं में से 63 हजार 275 मतदाताओं ने अपने मताधिकार का प्रयोग किया है। साथ ही इस बार नूरपुर हलके में 72.81 प्रतिशत पुरुषों के मुकाबले करीब 8.44 फीसदी ज्यादा महिलाओं (81.25 प्रतिशत) ने मतदान किया है। इस हॉट सीट पर कांग्रेस के अजय महाजन और भाजपा के राकेश पठानिया तीसरी बार आमने-सामने है। आंकड़ों पर नजर दौड़ाएं तो 2007 के चुनाव में नूरपुर में 74.38, 2012 में 78.25 और इस बार 77.97 प्रतिशत मतदान दर्ज किया गया। इस बंपर मतदान को भले ही दोनों प्रत्याशी अपने पक्ष में बताते हुए जीत का दावा ठोक रहे हैं, पर कहीं कम तो कहीं अधिक मतदान से नेताओं को भीतर से उलटफेर का डर भी सता रहा है। हालांकि, नूरपुर विस क्षेत्र में मतदाता ज्यादातर सत्ता के साथ ही चलते रहे हैं, लेकिन मतदान प्रतिशतता के ताजा आंकड़े को भीतरी तौर पर कोई भी दावे के साथ अपनी जीत से जोड़कर सुकून की सांस नहीं ले पा रहा है। आमतौर पर ज्यादा मतदान को सत्ता के खिलाफ जनादेश से जोड़कर देखा जाता हैै, लेकिन नूरपुर विधानसभा सीट पर कांग्रेस प्रत्याशी अजय महाजन और भाजपा प्रत्याशी राकेश पठानिया के बीच कांटे की टक्कर में मतदाताओं का रुझान किस तरफ रहा होगा, इस पर सबकी नजरें टिकी है। जहां कांग्रेस खेमा भाजपा में भितरघात होने की अटकलों के बीच अपनी जीत को सुनिश्चित बता रहा है तो वहीं, करीब चौदह साल बाद पार्टी सिंबल पर चुनावी रण में उतरे पूर्व विधायक राकेश पठानिया इसे सत्ता के खिलाफ वोट बताकर अपनी जीत का दम भर रहे हैं। राजनीतिक विश्लेषकों की मानें तो दोनों सियासी धुरंधरों का चुनावी अंकगणित काफी कुछ भितरघात, फीमेल वोट स्विंग और एंटी इंक्वेंसी फैक्टर के चलते होने वाले वोटों के हेरफेर पर टिका है।
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