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नूरपुर में हार-जीत जातीय समीकरणों पर निर्भर
Updated Wed, 01 Nov 2017 10:46 PM IST
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रितेश महाजन
नूरपुर (कांगड़ा)। नूरपुर विधानसभा सीट का चुनावी नतीजा इस बार जातीय समीकरणों की रोचक जंग का गवाह बनेगा। हलके में मतदाताओं से जुड़े कास्ट बेस फैक्टर को अपने पक्ष में भुनाना दोनों राजनीतिक दलों और उनके प्रत्याशियों के लिए चुनौती से कम नहीं है।
खासकर राजपूत और एससी मतदाताओं की दो-तिहाई हिस्सेदारी किसी भी प्रत्याशी के चुनावी समीकरण बिगाड़ सकती है। आंकड़ों पर नजर दौड़ाएं तो राजपूत बाहुल्य नूरपुर विस क्षेत्र में कुल मतदाताओं की संख्या 82,260 के करीब है। महिला और पुरुष मतदाताओं की हिस्सेदारी में 2226 मतों का अंतर है। हलके में इस बार 42,243 पुरुष और 40,017 हजार महिलाएं अपने मताधिकार का इस्तेमाल करेंगी। रोचक बात यह है कि कुल मतदाताओं में राजपूत और एससी वर्ग के मतदाताओं की तादाद सबसे ज्यादा है। 50 फीसदी राजपूत मतदाताओं की संख्या नूरपुर सीट में अन्य वर्गों पर पूरी तरह हावी है। संख्या बल के आधार पर दूसरा नंबर एससी वर्ग और तीसरा ओबीसी वर्ग के मतदाताओं का है। राजपूत वोट बैंक में अच्छी-खासी पकड़ के बूते ही कांग्रेस से स्व. सत महाजन को पांच बार विस पहुंचने का मौका मिला। 2007 के विस चुनाव में नूरपुर सीट से बतौर आजाद उम्मीदवार चुनाव जीतने वाले राकेश पठानिया समेत भाजपा से मालविका पठानिया और बसपा प्रत्याशी केवल सिंह पठानिया सरीखे नेताओं के चुनावी दंगल में कूदने से मौजूदा कांग्रेस विधायक अजय महाजन को हार का मुंह देखना पड़ा था। वहीं, परिसीमन के बाद नूरपुर विस क्षेत्र के नए स्वरूप में वरडां बैल्ट जुड़ने से राजपूत फैक्टर और मजबूत हुआ है। जातीय समीकरणों पर नजर दौड़ाएं तो बीते चार दशकों में नूरपुर सीट से कांग्रेस ने इक्का-दुक्का चुनावों को छोड़कर राजपूत प्रत्याशी पर दांव नहीं लगाया है। 1996 के उपचुनाव और 1998 के आम चुनाव में दोनों दलों ने राजपूत प्रत्याशियों को चुनाव मैदान में उतारा था। उपचुनाव में कांग्रेस के रणजीत बख्शी ने बाजी मारी तो आम चुनाव में राकेश पठानिया ने भगवा लहराकर इतिहास रचा। 2003 के चुनाव में पुन: प्रदेश की राजनीति में लौटे फील्ड मार्शल सत महाजन ने राजपूत वोट बैंक में सेंध लगाकर नूरपुर की सीट को कांग्रेस की झोली में डाल दिया। इसके बाद 2007 में भाजपा से टिकट कटने के बाद बतौर निर्दलीय प्रत्याशी चुनाव मैदान में उतरे राकेश पठानिया ने हलके के दिग्गज राजपूत नेता केवल सिंह पठानिया के बतौर आजाद उम्मीदवार जीतने के रिकार्ड की बराबरी की। हालांकि, इस बार कांग्रेस प्रत्याशी अजय महाजन और भाजपा के राकेश पठानिया आमने सामने हैं। ऐसे में दोनों सियासी धुरंधर जातिगत समीकरणों को कैसे अपने पक्ष में भुनाते हैं, यह देखना दिलचस्प होगा।
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नूरपुर (कांगड़ा)। नूरपुर विधानसभा सीट का चुनावी नतीजा इस बार जातीय समीकरणों की रोचक जंग का गवाह बनेगा। हलके में मतदाताओं से जुड़े कास्ट बेस फैक्टर को अपने पक्ष में भुनाना दोनों राजनीतिक दलों और उनके प्रत्याशियों के लिए चुनौती से कम नहीं है।
खासकर राजपूत और एससी मतदाताओं की दो-तिहाई हिस्सेदारी किसी भी प्रत्याशी के चुनावी समीकरण बिगाड़ सकती है। आंकड़ों पर नजर दौड़ाएं तो राजपूत बाहुल्य नूरपुर विस क्षेत्र में कुल मतदाताओं की संख्या 82,260 के करीब है। महिला और पुरुष मतदाताओं की हिस्सेदारी में 2226 मतों का अंतर है। हलके में इस बार 42,243 पुरुष और 40,017 हजार महिलाएं अपने मताधिकार का इस्तेमाल करेंगी। रोचक बात यह है कि कुल मतदाताओं में राजपूत और एससी वर्ग के मतदाताओं की तादाद सबसे ज्यादा है। 50 फीसदी राजपूत मतदाताओं की संख्या नूरपुर सीट में अन्य वर्गों पर पूरी तरह हावी है। संख्या बल के आधार पर दूसरा नंबर एससी वर्ग और तीसरा ओबीसी वर्ग के मतदाताओं का है। राजपूत वोट बैंक में अच्छी-खासी पकड़ के बूते ही कांग्रेस से स्व. सत महाजन को पांच बार विस पहुंचने का मौका मिला। 2007 के विस चुनाव में नूरपुर सीट से बतौर आजाद उम्मीदवार चुनाव जीतने वाले राकेश पठानिया समेत भाजपा से मालविका पठानिया और बसपा प्रत्याशी केवल सिंह पठानिया सरीखे नेताओं के चुनावी दंगल में कूदने से मौजूदा कांग्रेस विधायक अजय महाजन को हार का मुंह देखना पड़ा था। वहीं, परिसीमन के बाद नूरपुर विस क्षेत्र के नए स्वरूप में वरडां बैल्ट जुड़ने से राजपूत फैक्टर और मजबूत हुआ है। जातीय समीकरणों पर नजर दौड़ाएं तो बीते चार दशकों में नूरपुर सीट से कांग्रेस ने इक्का-दुक्का चुनावों को छोड़कर राजपूत प्रत्याशी पर दांव नहीं लगाया है। 1996 के उपचुनाव और 1998 के आम चुनाव में दोनों दलों ने राजपूत प्रत्याशियों को चुनाव मैदान में उतारा था। उपचुनाव में कांग्रेस के रणजीत बख्शी ने बाजी मारी तो आम चुनाव में राकेश पठानिया ने भगवा लहराकर इतिहास रचा। 2003 के चुनाव में पुन: प्रदेश की राजनीति में लौटे फील्ड मार्शल सत महाजन ने राजपूत वोट बैंक में सेंध लगाकर नूरपुर की सीट को कांग्रेस की झोली में डाल दिया। इसके बाद 2007 में भाजपा से टिकट कटने के बाद बतौर निर्दलीय प्रत्याशी चुनाव मैदान में उतरे राकेश पठानिया ने हलके के दिग्गज राजपूत नेता केवल सिंह पठानिया के बतौर आजाद उम्मीदवार जीतने के रिकार्ड की बराबरी की। हालांकि, इस बार कांग्रेस प्रत्याशी अजय महाजन और भाजपा के राकेश पठानिया आमने सामने हैं। ऐसे में दोनों सियासी धुरंधर जातिगत समीकरणों को कैसे अपने पक्ष में भुनाते हैं, यह देखना दिलचस्प होगा।
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