आईआईटी मंडी का शोध: मनाली-लेह रेललाइन के पांच स्टेशन प्राकृतिक खतरे वाले क्षेत्रों में, बन सकते हैं चुनौती
ऊंचे पहाड़, ग्लेशियर, बर्फ से जमी रहने वाली जमीन और बदलती जलवायु इस परियोजना की सुरक्षा के लिए चुनौती बन सकते हैं। आईआईटी मंडी के शोधकर्ताओं ने अध्ययन में रेललाइन के आसपास ऐसे कई क्षेत्रों की पहचान की है, जहां प्राकृतिक खतरों के प्रति अधिक सतर्क रहने की जरूरत है।
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मनाली-लेह रेललाइन हिमालय के दुर्गम क्षेत्रों को जोड़ने के साथ सामरिक और पर्यटन की दृष्टि से महत्वपूर्ण साबित हो सकती है, लेकिन इसके निर्माण के रास्ते में प्रकृति की चुनौतियां भी कम नहीं हैं। ऊंचे पहाड़, ग्लेशियर, बर्फ से जमी रहने वाली जमीन और बदलती जलवायु इस परियोजना की सुरक्षा के लिए चुनौती बन सकते हैं। आईआईटी मंडी के शोधकर्ताओं ने अध्ययन में रेललाइन के आसपास ऐसे कई क्षेत्रों की पहचान की है, जहां प्राकृतिक खतरों के प्रति अधिक सतर्क रहने की जरूरत है।
अध्ययन के अनुसार रेललाइन के खुले हिस्से का 17.21 किमी क्षेत्र उच्च संवेदनशीलता की श्रेणी में है। वहीं, पांच प्रस्तावित रेलवे स्टेशन भी ऐसे क्षेत्रों में स्थित हैं। आईआईटी मंडी के स्कूल ऑफ सिविल एंड एनवायरनमेंटल इंजीनियरिंग के कीर्ति कुमार महंत, इप्शिता प्रियदर्शिनी प्रधान और डॉ. डेरिक्स प्रेज शुक्ला ने यह अध्ययन किया है। शोधपत्र जियोडेसी एंड जियोडायनेमिक्स में ऑनलाइन प्रकाशित हुआ है। शोधकर्ताओं ने प्रस्तावित रेललाइन के आसपास 20 किमी के दायरे का अध्ययन किया।
सुरंग वाले हिस्से में 27.59 किमी क्षेत्र उच्च और 10.09 किमी बहुत अधिक संवेदनशीलता की श्रेणी में
इसमें जमीन की ऊंचाई, ढलान, चट्टानों की बनावट, ग्लेशियरों और हिमनद झीलों से दूरी, नदियों और भूगर्भीय दरारों की स्थिति समेत नौ मानकों को आधार बनाया गया। इसके आधार पर संवेदनशील क्षेत्रों का मानचित्र तैयार किया गया। अध्ययन में करीब 275.43 किमी लंबी रेललाइन के खुले और सुरंग वाले हिस्सों का आकलन किया गया। खुले हिस्से में 17.21 किमी क्षेत्र उच्च और 52.55 किमी मध्यम संवेदनशीलता वाला पाया गया। सुरंग वाले हिस्से में 27.59 किमी क्षेत्र उच्च और 10.09 किमी बहुत अधिक संवेदनशीलता की श्रेणी में रखा गया है।
अध्ययन संभावित खतरों के प्रति संवेदनशील क्षेत्रों की करता है पहचान
शोध में प्रस्तावित 15 रेलवे स्टेशनों में से छुछोट, फे यार्ड, देबरिंग, शे रोड और दारचा को उच्च संवेदनशीलता वाले क्षेत्रों में शामिल किया गया है। वहीं, कीलोंग, रुमत्से, करु, अपर सरचू, पात्सियो और स्टकना मध्यम संवेदनशीलता वाले क्षेत्रों में हैं। उपशी और हेमिस को कम, जबकि सिस्सू और लेह को बहुत कम संवेदनशीलता की श्रेणी में रखा गया है।शोधकर्ताओं के अनुसार तापमान में बदलाव के कारण लंबे समय से जमी रहने वाली जमीन यानी पर्माफ्रॉस्ट के पिघलने से जमीन धंसने और पहाड़ी ढलानों के अस्थिर होने की आशंका रहती है। अध्ययन में निर्माण से पहले संवेदनशील क्षेत्रों की विस्तृत भू-तकनीकी जांच, आपदा निगरानी और पूर्व चेतावनी प्रणाली विकसित करने की सिफारिश की गई है। शोधकर्ताओं ने स्पष्ट किया है कि यह अध्ययन संभावित खतरों के प्रति संवेदनशील क्षेत्रों की पहचान करता है, किसी आपदा की निश्चित भविष्यवाणी नहीं।
लेह-मनाली रेललाइन जैसे बड़े निर्माण कार्य में केवल रास्ता तय करना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि उस क्षेत्र की भौगोलिक और प्राकृतिक परिस्थितियों को समझना भी जरूरी है। पर्माफ्रॉस्ट, ग्लेशियर और अस्थिर पहाड़ी ढलानों से जुड़े संभावित खतरों का पहले से आकलन किया जाना चाहिए। समय रहते निगरानी, पूर्व चेतावनी और ठंडे पहाड़ी क्षेत्रों के अनुकूल निर्माण तकनीक अपनाने से रेललाइन की सुरक्षा को बेहतर बनाया जा सकता है।-डॉ. डेरिक्स प्रेज शुक्ला, प्रोफेसर, आईआईटी मंडी