आईआईटी मंडी सम्मेलन: विशेषज्ञ बोले- एक नहीं, कई संकट साथ, बनानी होगी बहु-आपदा रणनीति
प्राकृतिक आपदाओं के बढ़ते जोखिम के बीच विशेषज्ञों ने चेताया है कि केवल एकल आपदा आधारित योजनाएं अब पर्याप्त नहीं होंगी।
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हिमालयी क्षेत्रों में बाढ़, बादल फटना, हिमनदीय झील फटना (जीएलओएफ), भूस्खलन और भूकंप जैसी प्राकृतिक आपदाओं के बढ़ते जोखिम के बीच विशेषज्ञों ने चेताया है कि केवल एकल आपदा आधारित योजनाएं अब पर्याप्त नहीं होंगी। बहु-आपदा जोखिम को ध्यान में रखकर समन्वित रणनीति अपनाने, प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली मजबूत करने और वैज्ञानिक शोध को प्रभावी नीतियों में बदलने की दिशा में तेजी से काम करने की जरूरत है। यह निष्कर्ष आईआईटी मंडी में आयोजित तीन दिवसीय अंतरराष्ट्रीय जलवायु एवं आपदा-रोधी हिमालय सम्मेलन के समापन पर सामने आया। आईआईटी मंडी में वैश्विक सम्मेलन संस्थान के निदेशक प्रो. लक्ष्मीधर बेहरा के संरक्षण में हुआ।
अध्यक्षता प्रो. कला वेंकट उदय ने की। आयोजन सचिव प्रो. विवेक गुप्ता रहे। सम्मेलन में देश-विदेश के वैज्ञानिकों, इंजीनियरों और नीति निर्माताओं ने हिमालयी क्षेत्र के सामने बढ़ती जलवायु एवं आपदा संबंधी चुनौतियों पर मंथन किया। सम्मेलन का उद्देश्य वैज्ञानिक शोध, नीतिगत निर्णयों और इंजीनियरिंग समाधानों के बीच तालमेल स्थापित कर हिमालयी क्षेत्र की आपदा रोधी क्षमता को मजबूत करना रहा। सम्मेलन में जॉर्जिया प्रौद्योगिकी संस्थान के प्रो. जे. डेविड फ्रॉस्ट, कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय, मर्सिड के प्रो. सफीक खान, इम्पीरियल कॉलेज लंदन, मिशिगन स्टेट विश्वविद्यालय, विभिन्न आईआईटी, सीएसआईआर-राष्ट्रीय भूभौतिकीय अनुसंधान संस्थान, राष्ट्रीय जल विज्ञान संस्थान, राष्ट्रीय भूकंप विज्ञान केंद्र समेत कई संस्थानों के विशेषज्ञों ने भाग लिया। तकनीकी सत्रों में बहु-आपदा जोखिम आकलन, जलवायु पूर्वानुमान, जल एवं हिमनदी संबंधी चरम घटनाएं, भूकंपरोधी अवसंरचना, एआई एवं मशीन लर्निंग आधारित प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली तथा समुदाय आधारित आपदा प्रबंधन पर चर्चा हुई।
विशेषज्ञों ने कहा कि अत्यधिक वर्षा जैसी एक घटना बाढ़, भूस्खलन और अवसंरचनात्मक क्षति जैसी कई आपदाओं को एक साथ जन्म दे सकती है। इसलिए समग्र जोखिम के आधार पर योजना बनाना, विभिन्न एजेंसियों के बीच डाटा साझाकरण, जोखिम मानचित्रण, मजबूत अवसंरचना में निवेश और स्थानीय समुदायों की भागीदारी बढ़ाना जरूरी है। साथ ही वैज्ञानिक अनुसंधान को प्रभावी नीतियों में बदलकर उसका लाभ जोखिम वाले गांवों, कस्बों और महत्वपूर्ण अवसंरचनाओं तक पहुंचाने पर भी जोर दिया गया।