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HP High Court: हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने कहा- आपदा में भी सीएसआर लेने के लिए सरकार ने कुछ नहीं किया

Fri, 19 Dec 2025 04:00 AM IST
अंकेश डोगरा संवाद न्यूज एजेंसी, शिमला।
संवाद न्यूज एजेंसी, शिमला। Published by: अंकेश डोगरा Updated Fri, 19 Dec 2025 04:00 AM IST
सार

इस साल मानसून सीजन में हुए भारी नुकसान की भरपाई और आपदा राहत को लेकर हिमाचल हाईकोर्ट ने कहा कि कंपनी अधिनियम 2013 की धारा 135 के तहत कंपनियों को मुनाफे का 2 फीसदी सामाजिक उत्तरदायित्व (सीएसआर) पर खर्च करना अनिवार्य है, लेकिन राज्य सरकार ने आपदा के बावजूद इन्हें कोई निर्देश जारी नहीं किए। पढ़ें पूरी खबर...

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HP High Court said that the government did nothing to utilize CSR funds even during the disaster
हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट - फोटो : अमर उजाला नेटवर्क

विस्तार

हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने इस साल मानसून सीजन में हुए भारी नुकसान की भरपाई और आपदा राहत में कॉर्पोरेट जगत के योगदान को लेकर कड़ा रुख अपनाया है। मुख्य न्यायाधीश गुरमीत सिंह संधावालिया और न्यायाधीश जिया लाल भारद्वाज की खंडपीठ ने कहा कि केंद्र और राज्य सरकार अपनी जिम्मेदारी निभाने में विफल रही है। अदालत ने कहा कि कंपनी अधिनियम 2013 की धारा 135 के तहत कंपनियों को मुनाफे का 2 फीसदी सामाजिक उत्तरदायित्व (सीएसआर) पर खर्च करना अनिवार्य है, लेकिन राज्य सरकार ने आपदा के बावजूद इन्हें कोई निर्देश जारी नहीं किए।

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सरकार की ओर से तर्क दिया गया कि केंद्र सरकार के निर्देशों के कारण वह कंपनियों के स्वतंत्र निर्णय लेने की शक्ति में हस्तक्षेप नहीं कर सकते। हाईकोर्ट ने इस तर्क को खारिज करते हुए कहा कि राज्य एक सक्षम वातावरण बनाने के लिए स्वतंत्र था, जो उसने नहीं किया। कोर्ट ने राज्य सरकार को निर्देश दिए हैं कि वह एक नया हलफनामा दायर कर बताए कि उद्योगों से सीएसआर प्रावधानों को प्रभावी ढंग से लागू करवाने के लिए क्या कदम उठाए जा रहे हैं। राज्य को उन सभी उद्योगों की पहचान करने को कहा गया है, जो धारा 135 के तहत आते हैं। अगली सुनवाई 5 मार्च को होगी।

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कोर्ट ने उन 80 कंपनियों की सूची का उल्लेख किया, जो सीएसआर के दायरे में आती हैं, लेकिन कई बड़ी कंपनियों ने वित्तीय वर्ष 2025-26 के लिए अपना डाटा तक साझा नहीं किया है। कोर्ट ने टिप्पणी की कि हिमाचल प्रदेश के प्राकृतिक संसाधनों की लूट की जा रही है। बदले में आपदा की भरपाई के लिए सामाजिक जिम्मेदारी नहीं समझ रहे हैं। खंडपीठ ने कहा कि राज्य और केंद्र दोनों ने सीएसआर के तहत कॉरपोरेट जगत से आपदा के लिए पैसे लेने में निष्क्रियता दिखाई है।

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करोड़ों का टर्नओवर, आपदा राहत में दी बहुत कम राशि
कोर्ट ने बद्दी-नालागढ़ में विप्रो एंटरप्राइजेज, कोलगेट पॉमोलिव, गोदरेज कंज्यूमर प्रोडक्ट्स, लोरियल इंडिया, ग्लेनमार्क, प्रॉक्टर एंड गैंबल, ल्यूमिनस पावर, पांवटा साहिब और कालाअंब में शीला फोम, पिडिलाइट इंडस्ट्रीज और लैबोरेट फार्मास्युटिकल्स के नाममात्र के योगदान पर हैरानी जताई। आश्चर्य व्यक्त किया कि करोड़ों के टर्नओवर वाली बहुराष्ट्रीय कंपनियां आपदा राहत के नाम पर बहुत कम राशि खर्च कर रही हैं। गोदरेज कंज्यूमर प्रोडक्ट्स ने मात्र 86 हजार, अल्ट्राटेक सीमेंट लिमिटेड ने 6.34 लाख और डॉ. रेड्डीज लेबोरेटरीज 77.44 लाख रुपये दिए।

आवेदन के समय करना होगा आरक्षण का दावा, बाद में नहीं मिलेगा लाभ : हाईकोर्ट
हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि यदि कोई उम्मीदवार आवेदन करते समय आरक्षण का लाभ नहीं चुनता है, तो चयन प्रक्रिया शुरू होने या असफल होने के बाद वह पिछड़ी श्रेणी के आधार पर नियुक्ति का दावा नहीं कर सकता। न्यायाधीश रंजन शर्मा की अदालत ने पाया कि विज्ञापन में ओबीसी के लिए आरक्षण का प्रावधान होने के बावजूद, याचिकाकर्ता ने सामान्य श्रेणी के उम्मीदवार के रूप में आवेदन किया था।

आवेदन के साथ कोई ओबीसी प्रमाणपत्र भी संलग्न नहीं किया गया था। एक बार जब याचिकाकर्ता ने स्वयं ओबीसी उम्मीदवार के रूप में आरक्षण का लाभ नहीं लेने का विकल्प चुना और सामान्य श्रेणी में भाग लेकर असफल हो गई, तो उसके पास वापस मुड़ने और ओबीसी पद पर नियुक्ति का दावा करने का न तो कोई अधिकार है और न ही कोई आधार।

बता दें कि याचिकाकर्ता बलजिंदर कौर ने अदालत में प्रतिवादी की नियुक्ति को चुनौती दी थी। याचिकाकर्ता का तर्क था कि वह अन्य पिछड़ा वर्ग श्रेणी से संबंध रखती है, इसलिए 2010 के विज्ञापन के अनुसार उसे ओबीसी आरक्षित पद पर नियुक्ति दी जानी चाहिए थी। कोर्ट ने पाया कि जिस उम्मीदवार को ओबीसी श्रेणी के तहत नियुक्त किया गया था, उसके पास आवश्यक योग्यता और वैध प्रमाणपत्र दोनों थे, इसलिए उनकी नियुक्ति पूरी तरह वैध है। उम्मीदवारों को अपनी श्रेणी का चुनाव और संबंधित दस्तावेज आवेदन जमा करते समय ही प्रस्तुत करने होंगे।




 
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