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Hindi News ›   Himachal Pradesh ›   HP High Court An agreement cannot be challenged directly after accepting compensation

हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट: मुआवजा स्वीकार करने के बाद समझौते को सीधे तौर पर नहीं दी जा सकती चुनौती

Fri, 12 Dec 2025 05:00 AM IST
अंकेश डोगरा भारती मेहता, शिमला।
भारती मेहता, शिमला। Published by: अंकेश डोगरा Updated Fri, 12 Dec 2025 05:00 AM IST
सार

सूर्य नारायण बांध विस्थापित संघर्ष समिति नीरथ की ओर से दायर एक लेटर्स पेटेंट अपील (एलपीए) को हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने खारिज कर दिया है। पढ़ें पूरी खबर...

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HP High Court An agreement cannot be challenged directly after accepting compensation
हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट - फोटो : अमर उजाला नेटवर्क

विस्तार

हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने लूहरी परियोजना में अधिग्रहित भूमि के आदेश के खिलाफ सूर्य नारायण बांध विस्थापित संघर्ष समिति नीरथ की ओर से दायर एक लेटर्स पेटेंट अपील (एलपीए) को खारिज कर दिया है। खंडपीठ ने एकल न्यायाधीश की ओर से लगाए गए एक लाख रुपये के जुर्माने के फैसले को सही ठहराते हुए बरकरार रखा है। अदालत ने याचिकाकर्ता संगठन की लोकस स्टैंडाई (याचिका दायर करने का अधिकार) पर गंभीर सवाल उठाए हैं।

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मुख्य न्यायाधीश गुरमीत सिंह संधावालिया और न्यायाधीश जिया लाल भारद्वाज की खंडपीठ ने पाया कि याचिकाकर्ता सोसायटी एक फेंटम (काल्पनिक) संगठन है। सोसायटी के अध्यक्ष बाबू राम जिन्होंने हलफनामा दिया था, स्वयं उन 500 भूस्वामियों में से नहीं हैं, जिनकी जमीन एसजेवीएन लिमिटेड की ओर से खरीदी गई। भूस्वामियों और प्रभावित व्यक्तियों ने खुद इस चुनौती के लिए न्यायालय का रुख नहीं किया है। जिन भूस्वामियों ने 210 मेगावाट लूहरी एचईपी परियोजना के लिए बातचीत के माध्यम से समझौता राशि स्वीकार कर ली है और बिक्री विलेख (सेल डीड) निष्पादित किए हैं, वे अब इस प्रक्रिया को चुनौती नहीं दे सकते।

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खंडपीठ ने सर्वोच्च न्यायालय के फैसलों का हवाला देते हुए यह स्पष्ट किया कि एक बार जब पक्षकारों ने समझौते में राशि लेने का विकल्प चुन लिया है, तो वे मुआवजे में वृद्धि की मांग करने का अपना अधिकार खो देते हैं। उनका मूल वाद कारण समाप्त हो जाता है। यह देखते हुए कि बिक्री विलेख 2020 में निष्पादित हुए थे और याचिका 2024 में (चार साल बाद) दायर की गई, न्यायालय ने इसे कानूनी प्रक्रिया का दुरुपयोग माना।

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पीठ ने टिप्पणी की कि इस प्रकार के संगठन जो बिना किसी आधार के केवल निहित स्वार्थों के लिए याचिकाएं दायर करते हैं, न्यायालय का समय बर्बाद करते हैं। अदालत ने अपील को योग्यता रहित पाते हुए खारिज कर दिया गया। सूर्य नारायण बांध विस्थापित संघर्ष समिति नीरथ ने एकल जज के फैसले को डबल बेंच में चुनौती दी थी। उन्होंने याचिका में अदालत से मुआवजे राशि को बढ़ाने की मांग की गई थी, लेकिन एकल पीठ ने समिति पर ही सवालिया निशान लगा दिया कि किस आधार और किन प्रावधानों के तहत इस समिति ने सीधे हाईकोर्ट में याचिका दायर की गई है। खंडपीठ ने आदेश में कहा है कि अगर मुआवजे की राशि से सहमत नहीं थे तो उन्हें हाईकोर्ट में आने के बजाय निचली अदालत में चुनौती देनी चाहिए थी।

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