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Himachal News: बिन बारिश बगीचे सूखे, चिलिंग आवर्स पर संकट, गिर सकता है सेब उत्पादन; दो महीने से नहीं हुई बारिश
Sat, 21 Dec 2024 11:07 AM IST
अंकेश डोगरा
अमर उजाला ब्यूरो, शिमला
अमर उजाला ब्यूरो, शिमला
Published by: अंकेश डोगरा
Updated Sat, 21 Dec 2024 11:07 AM IST
सार
हिमाचल प्रदेश में बारिश, बर्फबारी न होने से सेब के बगीचे सूखे की चपेट में हैं। सूखे के कारण इस सीजन में अगर चिलिंग ऑवर्स पूरे नहीं होते तो फ्लावरिंग पर प्रभाव पड़ सकता है। पढ़ें पूरी खबर...
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सेब के पेड़।
- फोटो : अमर उजाला नेटवर्क
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विस्तार
हिमाचल प्रदेश में करीब दो महीने से सूखे जैसे हालात हैं। बारिश, बर्फबारी न होने से सेब के बगीचे सूखे की चपेट में हैं। बगीचों में चिलिंग ऑवर्स पूरे होने का संकट हो गया है। मौसम ऐसा ही रहा तो सेब उत्पादन गिर सकता है। बागवानी विश्वविद्यालय नौणी के क्षेत्रीय अनुसंधान केंद्र मशोबरा ने इसे देखते हुए एडवाइजरी जारी की है।
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क्षेत्रीय बागवानी अनुसंधान एवं प्रशिक्षण केंद्र मशोबरा के सह निदेशक डॉ. दिनेश सिंह ठाकुर ने बताया कि सेब के पौधों के लिए 7 डिग्री से कम तापमान में 800 से 1600 घंटे चिलिंग ऑवर्स की जरूरत रहती है। सूखे के कारण इस सीजन में अगर चिलिंग ऑवर्स पूरे नहीं होते तो फ्लावरिंग पर प्रभाव पड़ सकता है। एक समान फ्लावरिंग नहीं होगी और कमजोर फ्लावरिंग से फूल झड़ने की समस्या पेश आ सकती है। इससे सेब उत्पादन प्रभावित हो सकता है। अगले कुछ दिनों में अच्छी बारिश और बर्फबारी की आवश्यकता है। बागवान इस समय बगीचों में काट-छांट कर सकते हैं। नए बगीचे या फलदार पौधे लगाने के लिए जमीन में पर्याप्त नमी नहीं है।
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दिसंबर में बगीचों मे फॉस्फोरस और पोटाश खाद डाली जाती है, जिससे पौधों की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है और जड़ें मजबूत होती हैं। नमी न होने के चलते खाद डालने का काम प्रभावित हो रहा है जिससे बीमारियों का खतरा बढ़ सकता है। सिंचाई या नमी के अभाव में उर्वरकों का प्रयोग करने से बचें और नमी को बचाए रखने के लिए मल्चिंग करें। शुष्क मौसम में बगीचों में वूली एफिड का प्रकोप बढ़ सकता है। कीटों की संख्या नियंत्रित रखने के लिए वूली एफिड, स्केल, टहनियों के छेदक कीट तथा माइट ग्रसित टहनियों को काट कर नष्ट कर दें। घाव पर ताजा गोबर, गीली मिट्टी या चौबाटिया पेस्ट लगाएं। बोरर तथा वूली एफिड ग्रसित पौधों के तौलियों में जड़ों को खोद कर जड़ छेदक की सुंडियों को एकत्र कर डरमेट (800 मि. ली./200 ली. पानी) से उपचारित करें। नया पौधा लगाने से पहले उसे भी डरमेट के घोल में डुबोकर ही लगाएं।
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बगीचों में दिखने लगे कैंकर रोग के लक्षण
सूखे से पौधे कैंकर की चपेट में आ रहे हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि इससे बचाव के लिए तने पर बोर्डो पेंट या ताजे गोबर और मिट्टी का लेप लगाएं, ताकि सूर्य की किरणों से होने वाले नुकसान को बचाया जा सके। कांट-छांट के बाद बोर्डो मिश्रण का स्प्रे जरूर करें। नये पौधे रोपित करने के तुरंत बाद सिंचाई जरूर करें। प्राकृतिक खेती करने वाले किसान जीवामृत को फोलीयर स्प्रे के रूप में 10-20 प्रतिशत और 15 दिनों के अंतराल में ड्रेंचिंग जरूर करें।
सूखे से पौधे कैंकर की चपेट में आ रहे हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि इससे बचाव के लिए तने पर बोर्डो पेंट या ताजे गोबर और मिट्टी का लेप लगाएं, ताकि सूर्य की किरणों से होने वाले नुकसान को बचाया जा सके। कांट-छांट के बाद बोर्डो मिश्रण का स्प्रे जरूर करें। नये पौधे रोपित करने के तुरंत बाद सिंचाई जरूर करें। प्राकृतिक खेती करने वाले किसान जीवामृत को फोलीयर स्प्रे के रूप में 10-20 प्रतिशत और 15 दिनों के अंतराल में ड्रेंचिंग जरूर करें।