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हिमाचल हाईकोर्ट का फैसला: तकनीकी इस्तीफे के बाद पुराने विभाग की सेवा के आधार पर नहीं मिलेगी पदोन्नति

Mon, 02 Nov 2026 06:43 PM IST
Krishan Singh संवाद न्यूज एजेंसी, शिमला।
संवाद न्यूज एजेंसी, शिमला। Published by: Krishan Singh Updated Mon, 02 Nov 2026 06:43 PM IST
सार

अदालत ने स्पष्ट किया है कि यदि कोई कर्मचारी अपने मूल विभाग से तकनीकी इस्तीफा देकर किसी नए विभाग में शामिल होता है, तो उसके पुराने विभाग की सेवा को महज इस आधार पर नए विभाग में पदोन्नति के लिए अर्हकारी सेवा (क्वालीफाइंग सर्विस) के रूप में नहीं गिना जा सकता। 

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Himachal High Court: Promotion cannot be claimed based on service in a previous department following a 'techni
हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट। - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने सरकारी कर्मचारियों की पदोन्नति और सेवा नियमों को लेकर महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि यदि कोई कर्मचारी अपने मूल विभाग से तकनीकी इस्तीफा देकर किसी नए विभाग में शामिल होता है, तो उसके पुराने विभाग की सेवा को महज इस आधार पर नए विभाग में पदोन्नति के लिए अर्हकारी सेवा (क्वालीफाइंग सर्विस) के रूप में नहीं गिना जा सकता। न्यायालय ने कहा कि पुराने विभाग की सेवा का लाभ नए विभाग में पदोन्नति के लिए तभी मिल सकता है, जब संबंधित विभाग के भर्ती एवं प्रोन्नति (आरएंडपी) नियमों में इसका स्पष्ट प्रावधान हो। न्यायमूर्ति ज्योत्सना रिवाल दुआ की अदालत ने इंद्र पाल की ओर से दायर याचिका को खारिज करते हुए यह फैसला सुनाया।

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अदालत ने सरकार के कार्मिक विभाग के निर्देशों और स्थापित नियमों का हवाला देते हुए स्पष्ट किया कि तकनीकी इस्तीफे के आधार पर पिछली सेवा का लाभ केवल वेतन संरक्षण, पेंशन और वार्षिक वेतन वृद्धि की गणना जैसे लाभों के लिए मिलता है। इसे नए विभाग में पदोन्नति की पात्रता तय करने के लिए स्वतः आधार नहीं बनाया जा सकता। याचिकाकर्ता विश्वविद्यालय में किसी स्थानांतरण या विलय नीति के तहत नहीं आया था, बल्कि एक स्वतंत्र और नई चयन प्रक्रिया के माध्यम से भर्ती हुआ था। इसलिए उसे विश्वविद्यालय के कैडर में सबसे कनिष्ठ स्थान पर रखा गया।

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वह पुराने सेवाकाल के आधार पर वरिष्ठता या पदोन्नति का दावा नहीं कर सकता। अदालत ने कहा कि याचिकाकर्ता का दावा लागू सेवा नियमों के विपरीत है। मौलिक नियमों और सीसीएस (पेंशन) नियमों के प्रावधानों के तहत भी विश्वविद्यालय के लागू नियमों में पिछली सेवा को जोड़ने की अनुमति नहीं है। ऐसे में याचिकाकर्ता को राहत नहीं दी जा सकती। याचिकाकर्ता वर्ष 2001 में राज्य शिक्षा विभाग में क्लर्क के पद पर नियुक्त हुआ था। पदोन्नति पाते हुए अगस्त 2022 में वह अधीक्षक ग्रेड-टू के पद तक पहुंचा। इसी दौरान नवनिर्मित सरदार पटेल विश्वविद्यालय मंडी ने अधीक्षक ग्रेड-टू के पदों पर सीधी भर्ती के लिए आवेदन आमंत्रित किए। याचिकाकर्ता ने भी आवेदन किया और उसका चयन हो गया।

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विश्वविद्यालय में कार्यभार संभालने के लिए उसने शिक्षा विभाग से तकनीकी इस्तीफा दिया, जिसे विभाग ने स्वीकार कर लिया। इसके बाद विश्वविद्यालय में अनुभाग अधिकारी का पद खाली होने पर याचिकाकर्ता ने दावा किया कि शिक्षा विभाग में बिताए गए पिछले 21 वर्षों के सेवाकाल को जोड़कर उसे इस पद पर पदोन्नति दी जाए। विश्वविद्यालय प्रशासन ने उसकी मांग खारिज कर दी, जिसके बाद उसने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। अदालत ने पाया कि अनुभाग अधिकारी के पद पर पदोन्नति के लिए विश्वविद्यालय में अधीक्षक ग्रेड-टू के रूप में तीन वर्ष की सेवा या कुल 19 वर्ष की नियमित सेवा आवश्यक है। इन नियमों में किसी अन्य सरकारी विभाग से तकनीकी इस्तीफा देकर आने वाले कर्मचारी की पिछली सेवा को जोड़ने का कोई प्रावधान नहीं है।

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