हिमाचल हाईकोर्ट का आदेश: चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी 60 साल की उम्र में ही होंगे सेवानिवृत्त, याचिका स्वीकार
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि 10 मई 2001 से पहले पार्ट टाइम या दैनिक वेतन भोगी आधार पर नियुक्त हुए चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी, जिनकी सेवाएं बाद में नियमित हुईं, वे 60 वर्ष की आयु पूरी होने पर ही सेवानिवृत्त होंगे।
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हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि 10 मई 2001 से पहले पार्ट टाइम या दैनिक वेतन भोगी आधार पर नियुक्त हुए चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी, जिनकी सेवाएं बाद में नियमित हुईं, वे 60 वर्ष की आयु पूरी होने पर ही सेवानिवृत्त होंगे। न्यायाधीश ज्योत्सना रिवाल दुआ की अदालत ने याचिका स्वीकार करते हुए याचिकाकर्ता को 60 वर्ष की आयु तक सेवा जारी रखने का लाभ देने का आदेश दिया है। याचिकाकर्ता कौशल्या देवी को शिक्षा विभाग में 19 मई 2000 को पार्ट-टाइम वाटर कैरियर के रूप में नियुक्त किया गया था।
2016 में सेवाएं चपरासी के पद पर नियमित कर दी गईं
28 अक्तूबर 2016 को उनकी सेवाएं चपरासी (चतुर्थ श्रेणी) के पद पर नियमित कर दी गईं। उन्होंने राज्य सरकार की 21 फरवरी 2018 की अधिसूचना का लाभ मांगा था। इसके तहत फंडामेंटल रूल 56 में तीसरा प्रावधान जोड़ा गया है। इस प्रावधान के अनुसार 10 मई 2001 से पहले पार्ट-टाइम या दैनिक वेतन भोगी आधार पर नियुक्त और बाद में नियमित हुए चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी 60 वर्ष की आयु तक सेवाएं दे सकते हैं। सुनवाई के दौरान सरकार की ओर से संबंधित विभाग के निर्देश प्रस्तुत किए गए। इनमें स्वीकार किया गया कि याचिकाकर्ता का मामला अधिसूचना के दायरे में आता है। अदालत ने इन निर्देशों और तथ्यों को ध्यान में रखते हुए कहा कि कौशल्या देवी की नियुक्ति 19 मई 2000 को हुई थी, इसलिए वह अधिसूचना के तहत लाभ पाने की पात्र हैं।
बातचीत से जमीन देने वालों को भी मिलेगा बढ़ा हुआ मुआवजा
वहीं प्रदेश हाईकोर्ट ने सावड़ा-कुड्डू हाइड्रो-इलेक्ट्रिक प्रोजेक्ट के लिए भूमि अधिग्रहण के मामले में बड़ा फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि जिन भूस्वामियों ने सामान्य प्रक्रिया के बजाय आपसी बातचीत से जमीन दी थी, वे भी अदालतों द्वारा तय बढ़े हुए मुआवजे और वैधानिक लाभों के हकदार हैं। न्यायाधीश संदीप शर्मा की अदालत ने सभी याचिकाएं स्वीकार करते हुए एचपीपीसीएल को जिला जज और हाईकोर्ट के आदेशानुसार बढ़ा हुआ मुआवजा ब्याज सहित देने के निर्देश दिए हैं। मामले के अनुसार सरकार ने 27 अगस्त 2005 को सावड़ा-कुड्डू प्रोजेक्ट के लिए धारा-4 की अधिसूचना जारी की थी। कलेक्टर लैंड एक्विजिशन ने जुलाई 2007 में हाटकोटी, भरोट और घुन्सा गांवों के लिए मुआवजा तय किया था। याचिकाकर्ताओं की जमीन सामान्य अधिग्रहण के बजाय सरकार द्वारा गठित कमेटी के माध्यम से आपसी बातचीत के आधार पर वर्ष 2008 और 2009 में ली गई थी। इसके बाद सेल डीड निष्पादित कर इंतकाल संख्या 141 दर्ज किया गया था।
निजी बातचीत के जरिए जमीन के अधिग्रहण का निर्णय लिया गया था
अदालत ने पाया कि अदालत ने पाया कि जब वर्ष 2008 और 2009 में निजी बातचीत के जरिए जमीन के अधिग्रहण का निर्णय लिया गया था। इसके बाद एचपीपीसीएल के निदेशक मंडल ने मेमोरेंडम पास किया था। इसमें तय हुआ था कि यदि अदालतें मुआवजा राशि बढ़ाती हैं तो आपसी बातचीत से जमीन देने वालों को भी बढ़ी हुई दर और नौ फीसदी वार्षिक ब्याज मिलेगा। हाईकोर्ट ने एचपीपीसीएल की वह दलील भी खारिज कर दी कि याचिकाकर्ताओं ने 10 साल के बाद अदालत का दरवाजा खटखटाया है। अदालत ने कहा कि जब एचपीपीसीएल ने खुद अंतर राशि चुकाने की जिम्मेदारी ली थी तो अधिकारियों का कर्तव्य था कि वे स्वतः आगे आकर भुगतान करते। इसके लिए भूस्वामियों को दोषी नहीं ठहराया जा सकता। अदालत ने अपने पिछले फैसले (सतदेव सिंह बनाम हिमाचल प्रदेश राज्य) का हवाला दिया, जिसमें इसी प्रोजेक्ट के तहत निजी बातचीत से जमीन देने वाले एक अन्य व्यक्ति को भी इसी प्रकार का बढ़ा हुआ मुआवजा देने का आदेश दिया गया था। अदालत ने कहा कि राज्य या उसकी संस्थाएं एक निजी व्यक्ति की तरह अनुचित लाभ कमाने की कोशिश नहीं कर सकतीं।