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Hamirpur (Himachal) News: होली मेले से सिमट रहा मिट्टी के बर्तनों का कारोबार
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पूर्व में मेले में मिट्टी से बने बर्तनों का लगता था बाजार, अब एक-दो दुकानें दिख रहीं
सरकार से प्रोत्साहन न मिलने पर धीरे-धीरे कम होता जा रहा बर्तन बनाने का व्यवसाय
संवाद न्यूज एजेंसी
सुजानपुर(हमीरपुर)। उपमंडल सुजानपुर के राष्ट्र स्तरीय होली मेले में लगने वाला मिट्टी के बर्तनों का कुम्हार बाजार आहिस्ता-आहिस्ता अपनी पहचान खो रहा है। हालांकि, मिट्टी के बर्तनों का महत्व कम नहीं हुआ है लेकिन आधुनिक दौर में इस काम में लगे लोगों ने अपने हुनर को तवज्जो देना कम कर दिया है। पूर्व में जहां होली मेले में मिट्टी के बर्तनों का बाजार लगातार था, अब मेले में महज एक-दो दुकानें ही लग रही हैं। मिट्टी के बर्तनों को बनाने की कला का हुनर एक विशेष समुदाय कुम्हार को प्राप्त है। कभी इनकी मुख्य आय का स्रोत मिट्टी के बर्तनों की बिक्री ही हुआ करता था।
वर्ष भर सीजन के मुताबिक कुम्हार दीपावली पर्व और गर्मियों के सीजन के चलते पानी को ठंडा रखने के लिए मटके, घड़े, सुराही बर्तन बनाकर अपनी आजीविका चलाते थे लेकिन अब बदलते समय के अनुसार बर्तन बनाने वाला कोई नहीं है। गावों में कुछेक लोग मिट्टी के बर्तन बनाते हैं। मिट्टी के बर्तनों को बनाने के लिए जमीन से करीब 20 फीट गहरी मिट्टी को निकाल कर मिट्टी से बना एक बड़ा चक्का जिसमें मिट्टी के अलग-अलग बर्तन को ढाल कर बनाया जाता है। अच्छी तरह आग में सेंक कर इन्हें तैयार करते हैं। मिट्टी के बर्तन का पानी जहां पीने के लिए ठंडा होता है, वहीं स्वादिष्टता के साथ स्वास्थ्य के लिए भी अच्छा माना जाता है। वर्तमान में मेले में पहुंचे सतीश कुमार पिथा ने कहा कि हाथों से बने बर्तन का अपना ही महत्व है लेकिन आधुनिक मशीनरी की दौड़ में इस व्यवसाय से कारीगरों की अगली पीढ़ी मुंह मोड़ रही है। सरकार की ओर से भी कोई प्रोत्साहन नहीं मिल रहा है। इससे यह व्यवसाय कम होता जा रहा है।
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सरकार से प्रोत्साहन न मिलने पर धीरे-धीरे कम होता जा रहा बर्तन बनाने का व्यवसाय
संवाद न्यूज एजेंसी
सुजानपुर(हमीरपुर)। उपमंडल सुजानपुर के राष्ट्र स्तरीय होली मेले में लगने वाला मिट्टी के बर्तनों का कुम्हार बाजार आहिस्ता-आहिस्ता अपनी पहचान खो रहा है। हालांकि, मिट्टी के बर्तनों का महत्व कम नहीं हुआ है लेकिन आधुनिक दौर में इस काम में लगे लोगों ने अपने हुनर को तवज्जो देना कम कर दिया है। पूर्व में जहां होली मेले में मिट्टी के बर्तनों का बाजार लगातार था, अब मेले में महज एक-दो दुकानें ही लग रही हैं। मिट्टी के बर्तनों को बनाने की कला का हुनर एक विशेष समुदाय कुम्हार को प्राप्त है। कभी इनकी मुख्य आय का स्रोत मिट्टी के बर्तनों की बिक्री ही हुआ करता था।
वर्ष भर सीजन के मुताबिक कुम्हार दीपावली पर्व और गर्मियों के सीजन के चलते पानी को ठंडा रखने के लिए मटके, घड़े, सुराही बर्तन बनाकर अपनी आजीविका चलाते थे लेकिन अब बदलते समय के अनुसार बर्तन बनाने वाला कोई नहीं है। गावों में कुछेक लोग मिट्टी के बर्तन बनाते हैं। मिट्टी के बर्तनों को बनाने के लिए जमीन से करीब 20 फीट गहरी मिट्टी को निकाल कर मिट्टी से बना एक बड़ा चक्का जिसमें मिट्टी के अलग-अलग बर्तन को ढाल कर बनाया जाता है। अच्छी तरह आग में सेंक कर इन्हें तैयार करते हैं। मिट्टी के बर्तन का पानी जहां पीने के लिए ठंडा होता है, वहीं स्वादिष्टता के साथ स्वास्थ्य के लिए भी अच्छा माना जाता है। वर्तमान में मेले में पहुंचे सतीश कुमार पिथा ने कहा कि हाथों से बने बर्तन का अपना ही महत्व है लेकिन आधुनिक मशीनरी की दौड़ में इस व्यवसाय से कारीगरों की अगली पीढ़ी मुंह मोड़ रही है। सरकार की ओर से भी कोई प्रोत्साहन नहीं मिल रहा है। इससे यह व्यवसाय कम होता जा रहा है।
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