{"_id":"690b9dce1411fba5ef01e6b9","slug":"operation-sindoor-successful-in-himachal-flowers-bloom-in-veerbhoomi-hamirpur-hamirpur-hp-news-c-94-1-hmp1004-172460-2025-11-06","type":"story","status":"publish","title_hn":"Hamirpur (Himachal) News: हिमाचल में ऑपरेशन सिंदूर सफल, वीरभूमि हमीरपुर में खिले फूल","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
Hamirpur (Himachal) News: हिमाचल में ऑपरेशन सिंदूर सफल, वीरभूमि हमीरपुर में खिले फूल
Thu, 06 Nov 2025 12:26 AM IST
शिमला ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, हमीरपुर (हि. प्र.)
संवाद न्यूज एजेंसी, हमीरपुर (हि. प्र.)
Updated Thu, 06 Nov 2025 12:26 AM IST
विज्ञापन
आंगन में लगे सिंदूर के पौधे के पत्तों और टहनियों की कटिंग करते शिवेश राणा। संवाद।
पंकज राणा
रंगस (हमीरपुर)। हिमाचल में ऑपरेशन सिंदूर सफल हो गया है। हिमाचल प्रदेश के निचले क्षेत्रों में अब दक्षिण अफ्रीका में पाया जाने वाला सिंदूर का पौधा भी सफलता से फल-फूल रहा है।
वीरभूमि कहे जाने वाले जिला हमीरपुर के रंगस क्षेत्र के शिक्षित किसान-बागवान शिवेश राणा के घर लगे सिंदूर के पौधे में मात्र चार वर्षों में ही फूल निकल आए हैं, जिससे यह संकेत मिल रहा है कि अब जल्द ही इसमें फल और बीज भी लगने शुरू हो जाएंगे।
शिवेश राणा बताते हैं कि उन्होंने चार वर्ष पहले हर्बल गार्डन नेरी से सिंदूर का पौधा प्राप्त किया था। पौधे की नियमित देखभाल करने पर अब इसमें सेब के फूलों जैसी कलियां खिलने लगी हैं। उम्मीद है कि हिमाचल में सिंदूर की व्यावसायिक खेती की नई संभावनाएं खुलेंगी।
विज्ञापन
महाराष्ट्र में कुछ किसान इस पौधे से बने प्राकृतिक सिंदूर को 3000 हजार रुपये प्रतिकिलो के हिसाब से बेच रहे हैं। मौजूदा समय में न सिर्फ हिमाचल, बल्कि अन्य राज्यों में भी सिंथेटिक सिंदूर बाजारों में बिक रहा है। वैज्ञानिक तौर पर सिंदूर लगाने के कई तर्क दिए जाते हैं। वहीं, इस पौधे से तैयार होने वाले सिंदूर के औषधीय गुणों की बदौलत यह तर्क भी सार्थक प्रतीत होते हैं।
हिमाचल में 2008-09 पहला ट्रायल, उत्पादन भी आसान
आयुष विभाग के वरिष्ठ चिकित्सक डॉ. अशोक शर्मा ने बताया कि वर्ष 2008-09 में सिंदूर के पौधे को पहली बार हिमाचल प्रदेश में इंटरड्यूस किया गया था। उस समय वे आयुष विभाग में वरिष्ठ चिकित्सक और सेंट्रल काउंसिल ऑफ इंडियन मेडिसिन के सदस्य थे। उन्होंने बताया कि वे महाराष्ट्र के एक मित्र के घर से सिंदूर का बीज लेकर आए थे, और इसे सबसे पहले हर्बल गार्डन नेरी में परीक्षण के लिए दिया गया था। पहले ट्रायल में सफलता नहीं मिली, लेकिन दूसरे ट्रायल में बीज अंकुरित करने में सफलता प्राप्त की गई। उनका कहना है कि महज 20 हजार रुपये की प्रोसेसिंग यूनिट से प्राकृतिक सिंदूर का उत्पादन कर इसे बाजार में बेचा जा सकता है।
क्या है सिंदूर पौधे के औषधीय और पारंपरिक उपयोग
सिंदूर का पौधा केवल धार्मिक या प्रतीकात्मक महत्व नहीं रखता, बल्कि यह औषधीय दृष्टि से भी अत्यंत उपयोगी है। पारंपरिक चिकित्सा में इसका उपयोग घाव, त्वचा रोग और संक्रमणों के उपचार में किया जाता है। इसके बीजों से निकला प्राकृतिक रंग पूरी तरह गैर-विषाक्त होता है और बाहरी उपयोग के लिए सुरक्षित माना जाता है। इस रंग का प्रयोग प्राकृतिक सिंदूर, कॉस्मेटिक्स और हर्बल डाई के रूप में भी किया जा सकता है।
कोट
परीक्षण के दौरान पाया गया कि हिमाचल प्रदेश के निचले क्षेत्र इस पौधे की खेती के लिए अनुकूल हैं, क्योंकि यह पौधा सामान्यतः गर्म जलवायु में फलता-फूलता है। किसानों को पौधे वितरित किए गए हैं। किसान हिमाचल के निचले क्षेत्र के हर्बल गार्डन से इसके पौधे आसानी से प्राप्त कर सकते हैं।
-उज्ज्वल दीप शर्मा, परियोजना अधिकारी, हर्बल गार्डन आयुष विभाग
विज्ञापन
रंगस (हमीरपुर)। हिमाचल में ऑपरेशन सिंदूर सफल हो गया है। हिमाचल प्रदेश के निचले क्षेत्रों में अब दक्षिण अफ्रीका में पाया जाने वाला सिंदूर का पौधा भी सफलता से फल-फूल रहा है।
वीरभूमि कहे जाने वाले जिला हमीरपुर के रंगस क्षेत्र के शिक्षित किसान-बागवान शिवेश राणा के घर लगे सिंदूर के पौधे में मात्र चार वर्षों में ही फूल निकल आए हैं, जिससे यह संकेत मिल रहा है कि अब जल्द ही इसमें फल और बीज भी लगने शुरू हो जाएंगे।
विज्ञापन
शिवेश राणा बताते हैं कि उन्होंने चार वर्ष पहले हर्बल गार्डन नेरी से सिंदूर का पौधा प्राप्त किया था। पौधे की नियमित देखभाल करने पर अब इसमें सेब के फूलों जैसी कलियां खिलने लगी हैं। उम्मीद है कि हिमाचल में सिंदूर की व्यावसायिक खेती की नई संभावनाएं खुलेंगी।
विज्ञापन
महाराष्ट्र में कुछ किसान इस पौधे से बने प्राकृतिक सिंदूर को 3000 हजार रुपये प्रतिकिलो के हिसाब से बेच रहे हैं। मौजूदा समय में न सिर्फ हिमाचल, बल्कि अन्य राज्यों में भी सिंथेटिक सिंदूर बाजारों में बिक रहा है। वैज्ञानिक तौर पर सिंदूर लगाने के कई तर्क दिए जाते हैं। वहीं, इस पौधे से तैयार होने वाले सिंदूर के औषधीय गुणों की बदौलत यह तर्क भी सार्थक प्रतीत होते हैं।
हिमाचल में 2008-09 पहला ट्रायल, उत्पादन भी आसान
आयुष विभाग के वरिष्ठ चिकित्सक डॉ. अशोक शर्मा ने बताया कि वर्ष 2008-09 में सिंदूर के पौधे को पहली बार हिमाचल प्रदेश में इंटरड्यूस किया गया था। उस समय वे आयुष विभाग में वरिष्ठ चिकित्सक और सेंट्रल काउंसिल ऑफ इंडियन मेडिसिन के सदस्य थे। उन्होंने बताया कि वे महाराष्ट्र के एक मित्र के घर से सिंदूर का बीज लेकर आए थे, और इसे सबसे पहले हर्बल गार्डन नेरी में परीक्षण के लिए दिया गया था। पहले ट्रायल में सफलता नहीं मिली, लेकिन दूसरे ट्रायल में बीज अंकुरित करने में सफलता प्राप्त की गई। उनका कहना है कि महज 20 हजार रुपये की प्रोसेसिंग यूनिट से प्राकृतिक सिंदूर का उत्पादन कर इसे बाजार में बेचा जा सकता है।
क्या है सिंदूर पौधे के औषधीय और पारंपरिक उपयोग
सिंदूर का पौधा केवल धार्मिक या प्रतीकात्मक महत्व नहीं रखता, बल्कि यह औषधीय दृष्टि से भी अत्यंत उपयोगी है। पारंपरिक चिकित्सा में इसका उपयोग घाव, त्वचा रोग और संक्रमणों के उपचार में किया जाता है। इसके बीजों से निकला प्राकृतिक रंग पूरी तरह गैर-विषाक्त होता है और बाहरी उपयोग के लिए सुरक्षित माना जाता है। इस रंग का प्रयोग प्राकृतिक सिंदूर, कॉस्मेटिक्स और हर्बल डाई के रूप में भी किया जा सकता है।
कोट
परीक्षण के दौरान पाया गया कि हिमाचल प्रदेश के निचले क्षेत्र इस पौधे की खेती के लिए अनुकूल हैं, क्योंकि यह पौधा सामान्यतः गर्म जलवायु में फलता-फूलता है। किसानों को पौधे वितरित किए गए हैं। किसान हिमाचल के निचले क्षेत्र के हर्बल गार्डन से इसके पौधे आसानी से प्राप्त कर सकते हैं।
-उज्ज्वल दीप शर्मा, परियोजना अधिकारी, हर्बल गार्डन आयुष विभाग