{"_id":"687bea69da2299733605113a","slug":"debris-in-the-drains-and-dust-on-the-files-kept-accumulating-when-it-rained-the-officers-saw-the-ground-hamirpur-hp-news-c-94-1-hmp1004-161615-2025-07-20","type":"story","status":"publish","title_hn":"Hamirpur (Himachal) News: नालों में मलबा और फाइलों पर जमती रही धूल... आसमान बरसा तो अफसरों को दिखी जमीन","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
Hamirpur (Himachal) News: नालों में मलबा और फाइलों पर जमती रही धूल... आसमान बरसा तो अफसरों को दिखी जमीन
Sun, 20 Jul 2025 12:26 AM IST
शिमला ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, हमीरपुर (हि. प्र.)
संवाद न्यूज एजेंसी, हमीरपुर (हि. प्र.)
Updated Sun, 20 Jul 2025 12:26 AM IST
विज्ञापन
मसयाणा के समीप कुणाह में डंप की गई बड़ी चट्टानों के टुकड़े और मलबा। संवाद।
एफसीए में फोरलेन की 11 डंपिंग साइटें मंजूर, जांच में महज दो मिलीं, वन विभाग ने एनएचएआई से मांगा जवाब
दो साइटों में क्षमता से अधिक फेंका मलबा, एनएचएआई का तर्क - मलबे को निर्माण कार्य में किया जा रहा इस्तेमाल
कमलेश रतन भारद्वाज
हमीरपुर। निर्माणाधीन शिमला-मटौर फोरलेन के लिए 90 डिग्री की सीध में जंगल की पहाड़ी को काटा जाता रहा लेकिन किसी ने नहीं देखा। ब्लास्टिंग होती रही लेकिन धमाकों की आवाज किसी ने नहीं सुनी। अब आसमान बरसा और पहाड़ी थर्राई तो जिम्मेदार नींद से जागे हैं। जांच होने लगी तो कई खुलासे भी हो रहे।
फोरलेन के कोहली-चीबाहल टू लेन पैच में एफसीए के तहत 11 डंपिंग साइटें मंजूर हैं। लेकिन वन विभाग की जांच में महज दो ही साइटें मिली हैं। पाया गया है कि मसयाणा के समीप ही दो बड़ी डंपिंग की गईं जबकि नौ डंपिंग साइट जमीन पर मिली ही नहीं हैं। जांच में यह भी पाया गया है कि उचित संख्या में डंपिंग साइट विकसित न किए जाने के कारण ही मलबा कुणाह खड्ड में डंप किया गया है। हालांकि, नेशनल हाईवे अथॉरिटी ऑफ इंडिया (एनएचएआई) के अधिकारियों का तर्क है कि मलबे को निर्माण में भी प्रयोग किया जा रहा है। ऐसे में अधिक डंपिंग साइट विकसित नहीं की गई हैं।
अब सवाल यह उठ रहा है कि अधिक डंपिंग साइट की जरूरत नहीं थी, तो कुणाह खड्ड और सरकारी जमीन में मलबे को डंप क्यों किया गया है। वन विभाग ने इस पर एनएचएआई से जवाब मांगा है। बीते कुछ दिन से कोहली-चीलबाहल टू लेन पैच के निर्माण के मसयाणा जंगल की पहाड़ी को काटा जा रहा है। अवैज्ञानिक तरीके से पहाड़ी की कटिंग से जंगल को खतरा पैदा हो गया है। भारी बरसात में यहां पर ब्लास्टिंग की जा रही थी, जिससे भूस्खलन की दृष्टि से संवेदनशील इस जंगल को और भी अधिक खतरा पैदा हो गया है। वन विभाग ने इस संभावित खतरे को देखते हुए यहां पर निर्माण कार्य को बीते शुक्रवार को ही बंद करवा दिया है। वन विभाग अब यहां पर कुणाह खड्ड में डंपिंग और मसयाणा जंगल में अवैज्ञानिक कटान से हुए नुकसान का आकलन कर रहा है। डैमेज रिपोर्ट तैयार की जा रही है।
विज्ञापन
-- -
जरूरत हुई तो विकसित करेंगे और डंपिंग साइटें
एफसीए में बेशक 11 डंपिंग साइट मंजूर हैं, लेकिन यहां पर निर्माण में मलबे का प्रयोग किया जा रहा है। ऐसे में महज दो डंपिंग साइट विकसित की गई हैं। यदि इन साइट पर अधिक मलबा फेंका गया, तो यहां पर उचित कदम उठाने के निर्देश कंपनी को दिए जाएंगे। यदि अधिक डंपिंग साइट की जरूरत पड़ेगी, तो विकसित की जाएंगी। - विक्रम मीणा, परियोजना निदेशक, एनएचएआई
-- --
ब्लास्टिंग का मलबा कुणाह में, दो साइट में क्षमता से अधिक डंपिंग
जांच में पाया गया है कि एफसीए में मंजूर साइटों में से महज मसयाणा जंगल से समीप ही दो डपिंग साइट काे विकसित किया गया है। यहां पर भी क्षमता से अधिक मलबा फेंका गया है, जो कि सरकारी जमीन में भी डंप हुआ है। ब्लास्टिंग का मलबा भी कुणाह खड्ड में डंप किया गया है। डैमेज रिपोर्ट तैयार की जा रही है। एनएचएआई से जवाब भी मांगा गया है कि आखिर यहां पर नौ डंपिंग साइटों को क्यों विकसित नहीं किया गया। - अंकित सिंह, डीएफओ, वन मंडल, हमीरपुर
000
विज्ञापन
दो साइटों में क्षमता से अधिक फेंका मलबा, एनएचएआई का तर्क - मलबे को निर्माण कार्य में किया जा रहा इस्तेमाल
कमलेश रतन भारद्वाज
हमीरपुर। निर्माणाधीन शिमला-मटौर फोरलेन के लिए 90 डिग्री की सीध में जंगल की पहाड़ी को काटा जाता रहा लेकिन किसी ने नहीं देखा। ब्लास्टिंग होती रही लेकिन धमाकों की आवाज किसी ने नहीं सुनी। अब आसमान बरसा और पहाड़ी थर्राई तो जिम्मेदार नींद से जागे हैं। जांच होने लगी तो कई खुलासे भी हो रहे।
फोरलेन के कोहली-चीबाहल टू लेन पैच में एफसीए के तहत 11 डंपिंग साइटें मंजूर हैं। लेकिन वन विभाग की जांच में महज दो ही साइटें मिली हैं। पाया गया है कि मसयाणा के समीप ही दो बड़ी डंपिंग की गईं जबकि नौ डंपिंग साइट जमीन पर मिली ही नहीं हैं। जांच में यह भी पाया गया है कि उचित संख्या में डंपिंग साइट विकसित न किए जाने के कारण ही मलबा कुणाह खड्ड में डंप किया गया है। हालांकि, नेशनल हाईवे अथॉरिटी ऑफ इंडिया (एनएचएआई) के अधिकारियों का तर्क है कि मलबे को निर्माण में भी प्रयोग किया जा रहा है। ऐसे में अधिक डंपिंग साइट विकसित नहीं की गई हैं।
विज्ञापन
अब सवाल यह उठ रहा है कि अधिक डंपिंग साइट की जरूरत नहीं थी, तो कुणाह खड्ड और सरकारी जमीन में मलबे को डंप क्यों किया गया है। वन विभाग ने इस पर एनएचएआई से जवाब मांगा है। बीते कुछ दिन से कोहली-चीलबाहल टू लेन पैच के निर्माण के मसयाणा जंगल की पहाड़ी को काटा जा रहा है। अवैज्ञानिक तरीके से पहाड़ी की कटिंग से जंगल को खतरा पैदा हो गया है। भारी बरसात में यहां पर ब्लास्टिंग की जा रही थी, जिससे भूस्खलन की दृष्टि से संवेदनशील इस जंगल को और भी अधिक खतरा पैदा हो गया है। वन विभाग ने इस संभावित खतरे को देखते हुए यहां पर निर्माण कार्य को बीते शुक्रवार को ही बंद करवा दिया है। वन विभाग अब यहां पर कुणाह खड्ड में डंपिंग और मसयाणा जंगल में अवैज्ञानिक कटान से हुए नुकसान का आकलन कर रहा है। डैमेज रिपोर्ट तैयार की जा रही है।
विज्ञापन
जरूरत हुई तो विकसित करेंगे और डंपिंग साइटें
एफसीए में बेशक 11 डंपिंग साइट मंजूर हैं, लेकिन यहां पर निर्माण में मलबे का प्रयोग किया जा रहा है। ऐसे में महज दो डंपिंग साइट विकसित की गई हैं। यदि इन साइट पर अधिक मलबा फेंका गया, तो यहां पर उचित कदम उठाने के निर्देश कंपनी को दिए जाएंगे। यदि अधिक डंपिंग साइट की जरूरत पड़ेगी, तो विकसित की जाएंगी। - विक्रम मीणा, परियोजना निदेशक, एनएचएआई
ब्लास्टिंग का मलबा कुणाह में, दो साइट में क्षमता से अधिक डंपिंग
जांच में पाया गया है कि एफसीए में मंजूर साइटों में से महज मसयाणा जंगल से समीप ही दो डपिंग साइट काे विकसित किया गया है। यहां पर भी क्षमता से अधिक मलबा फेंका गया है, जो कि सरकारी जमीन में भी डंप हुआ है। ब्लास्टिंग का मलबा भी कुणाह खड्ड में डंप किया गया है। डैमेज रिपोर्ट तैयार की जा रही है। एनएचएआई से जवाब भी मांगा गया है कि आखिर यहां पर नौ डंपिंग साइटों को क्यों विकसित नहीं किया गया। - अंकित सिंह, डीएफओ, वन मंडल, हमीरपुर
000