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Eye problems : हिमाचल में कोरोनाकाल के बाद बच्चों में बढ़ गए नेत्ररोग, 4 साल में करीब 48 प्रतिशत की बढ़ोतरी

Sat, 30 Aug 2025 02:00 AM IST
अंकेश डोगरा हर्षित शर्मा, संवाद न्यूज एजेंसी, शिमला
हर्षित शर्मा, संवाद न्यूज एजेंसी, शिमला Published by: अंकेश डोगरा Updated Sat, 30 Aug 2025 02:00 AM IST
सार

हिमाचल प्रदेश में बच्चों में आंखों की समस्या तेजी से बढ़ रही है। आईजीएमसी शिमला के नेत्र रोग विभाग के अनुसार कोरोना महामारी से पहले 20 से 25 बच्चे आंखों की जांच के लिए अस्पताल आते थे, लेकिन अब यह संख्या 40 से 50 तक पहुंच चुकी है। पढ़ें पूरी खबर...

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Eye diseases increased among children in Himachal after the Corona period
सांकेतिक तस्वीर। - फोटो : अमर उजाला नेटवर्क

विस्तार

कोरोना महामारी ने बच्चों की आंखों की सेहत पर गहरा असर डाला है। आईजीएमसी शिमला के नेत्र रोग विभाग के अनुसार, महामारी से पहले रोजाना 20 से 25 बच्चे आंखों की जांच के लिए अस्पताल आते थे, लेकिन अब यह संख्या 40 से 50 तक पहुंच चुकी है। आंकड़ों के अनुसार बच्चों में आंखों की समस्या तेजी से बढ़ रही है।

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वर्ष 2018 में जहां 18 वर्ष से कम आयु के 3967 बच्चे नेत्र रोग विभाग की ओपीडी में आए थे, वहीं यह संख्या 2022 में बढ़कर 5877 हो गई। यानी चार साल में बच्चों के नेत्र रोगियों में करीब 48 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई। 2023 में यह आंकड़ा 7262 तक पहुंच गया, जो 2018 की तुलना में लगभग 83 प्रतिशत अधिक है। यह बढ़ोतरी इस बात का संकेत है कि कोविडकाल के बाद से बच्चों में आंखों की समस्याएं तेजी से बढ़ रही हैं। यदि यही रुझान जारी रहा तो आने वाले वर्षों में यह संख्या और ज्यादा हो सकती है।

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यह वृद्धि बच्चों के बढ़े हुए स्क्रीन टाइम की वजह से हुई है। पहले बच्चे औसतन 3.5 घंटे रोजाना स्क्रीन (मोबाइल, टीवी, लैपटॉप) का इस्तेमाल करते थे। अब यह बढ़कर 8 घंटे प्रतिदिन तक पहुंच गया है। वैश्विक स्तर पर प्रकाशित शोध में कहा गया है कि 2050 तक दुनिया की लगभग आधी आबादी मायोपिक होगी। भारत में भी यही रुझान देखा जा रहा है। एल.वी. प्रसाद आई इंस्टीट्यूट, विशाखापत्तनम और विजयवाड़ा के विशेषज्ञों ने हाल में चेतावनी दी है कि आने वाले वर्षों में आधे भारतीय बच्चे मायोपिया से ग्रस्त हो सकते हैं और स्कूल जाने वाले बच्चों का 50% हिस्सा मायोपिया का मरीज बन जाएगा।

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शोध क्या कहते हैं?
केरल जर्नल ऑफ ऑप्थैल्मोलॉजी (2023): महामारी के दौरान बच्चों में स्क्रीन टाइम चार घंटे प्रतिदिन से ज्यादा पाया गया। इंडियन जर्नल ऑफ ऑप्थैल्मोलॉजी (2022) के अनुसार, जिन बच्चों को रोजाना केवल 1 घंटा धूप मिल रही थी और जो 1 घंटे से ज्यादा मोबाइल गेम खेलते थे, उनमें मायोपिया का खतरा 3 गुना तक बढ़ गया। नॉर्थ इंडिया मायोपिया रूरल स्टडी (2022) के अनुसार, ग्रामीण बच्चों में मायोपिया की दर 6.4% पाई गई, लेकिन जो बच्चे ज्यादा समय बाहर खेलते थे, उनमें यह खतरा बेहद कम था। फ्रंटियर्स इन पब्लिक हेल्थ (2025) के अनुसार, माता-पिता का स्क्रीन उपयोग बच्चों पर सीधा असर डालता है। अगर घर में स्क्रीन टाइम नियंत्रित किया जाए और आउटडोर खेलों को बढ़ावा दिया जाए तो मायोपिया को काफी हद तक रोका जा सकता है।

मायोपिया यानी नजदीक की नजर कमजोर होने की समस्या
मायोपिया या नजदीक की नज़र कमजोर होना आंखों की ऐसी समस्या है, जिसमें पास की चीजें साफ दिखाई देती हैं लेकिन दूर की धुंधली दिखती हैं। यह समस्या तब होती है जब आंख का आकार सामान्य से लंबा हो जाता है या कॉर्निया की वक्रता अधिक हो जाती है, जिससे प्रकाश रेटिना पर सही ढंग से केंद्रित नहीं हो पाता। आजकल यह समस्या बच्चों में ज्यादा देखने को मिल रही है, जिसका मुख्य कारण है लंबे समय तक मोबाइल या कंप्यूटर स्क्रीन देखना, कम रोशनी में पढ़ना और बाहर खेलने की कमी। इसे रोकने के लिए बच्चों को रोजाना कम से कम 1 या 2 घंटे प्राकृतिक रोशनी में बाहर खेलने देना चाहिए, पढ़ाई या स्क्रीन टाइम के दौरान 20-20-20 नियम अपनाना चाहिए (हर 20 मिनट बाद 20 फीट दूर किसी वस्तु को 20 सेकंड तक देखें), और पढ़ते समय सही रोशनी व आसन का ध्यान रखना चाहिए। मायोपिया अक्सर 5 से 7 साल की उम्र में भी शुरू हो सकता है और कई बार बच्चों को इतनी कम उम्र में ही चश्मे की ज़रूरत पड़ जाती है ताकि उनकी पढ़ाई और रोजमर्रा का जीवन प्रभावित न हो।

अभी नहीं संभले तो 2050 तक आधे बच्चे चश्मे पर निर्भर होंगे
आईजीएमसी शिमला के नेत्र रोग विभाजाध्यक्ष डॉ. राम लाल शर्मा ने बताया कि लंबे समय तक स्क्रीन देखने से बच्चों की दृष्टि पर सीधा असर पड़ रहा है। यदि यही रफ्तार जारी रही तो आने वाले वर्षों में हालात गंभीर हो जाएंगे। 2050 तक आधे बच्चे चश्मे पर निर्भर होंगे स्क्रीन टाइम पर नियंत्रण, बच्चों को धूप में खेलने का समय देना और नियमित नेत्र जांच ही समाधान है।
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