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Chamba News: घर-घर गूंज रहा... पैहला ता नां लेइए नारैण दा

Mon, 17 Mar 2025 07:16 AM IST
शिमला ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, चम्बा
संवाद न्यूज एजेंसी, चम्बा Updated Mon, 17 Mar 2025 07:16 AM IST
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It is echoing in every house take the first step, Narayan da
चंबा के कियाणी में चैत्र माह को लेकर ढोलरू गाते लोग। -संवाद
चंबा। शिव भूमि चंबा अपनी समृद्ध लोकसंस्कृति और परंपराओं के लिए प्रसिद्ध है। इनमें से एक सबसे अनूठी और प्राचीन लोकगाथा है ‘ढोलरू गायन’, जो चैत्र मास की संक्रांति से शुरू होकर पूरे महीने चलता है। यह परंपरा एक विशेष जाति द्वारा निभाई जाती है, जिसमें वे ढोल की थाप पर पारंपरिक गीत गाते हुए घर-घर जाकर हिंदू नववर्ष की बधाई देते हैं।
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ढोलरू गायन की पौराणिक कथा शिव और विष्णु भगवान से जुड़ी हुई है। मान्यता है कि महादेव शिव जब भस्मासुर को भगवान शिव ने वरदान दिया था कि वह किसी पर भी हाथ रखेगा तो वह भस्म हो जाएगा। तब भस्मासुर देवी पार्वती पर मोहित हो गया और भगवान शिव पर हाथ रखने की कोशिश करने लगा। भगवान विष्णु ने मोहिनी अवतार लिया और भस्मासुर के सामने नृत्य करने की शर्त रखी। मगर भस्मासुर ने अपनी ही शक्ति से अपना अंत कर लिया।
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इसके बाद विष्णु भगवान ने अपने बाजू की मैल से एक महाशय को ढोल सहित उत्पन्न किया, जिसने ढोल की ताल पर गीत गाकर ऐसा माहौल बनाया कि भस्मीदंत नाचने लगा और खुद ही अपना सर्वनाश कर बैठा। इस घटना से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु ने उस महाशय को दो वरदान दिए। एक, उन्हें बांस की कला का अद्वितीय कौशल प्राप्त हुआ और दूसरा, चैत्र मास में वे अपने गीत-संगीत द्वारा लोगों को नए साल की बधाई देने के अधिकारी बने।
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चैत्र मास की शुरुआत होते ही चंबा जिले के विभिन्न गांवों और कस्बों में इस परंपरा को निभाने वाले विशेष समुदाय के लोग घर-घर जाकर ‘पैहला ता नां लेइये नारेण दा’ गाते हैं और परिवारों को नए साल की बधाई देते हैं। ढोल की थाप और परंपरागत लोकगीतों की गूंज से चंबा की फिजा भक्तिमय हो उठती है।

राम विवाह से जुड़ा ढोलरू गायन
लोक मान्यताओं के अनुसार, भगवान श्रीराम के विवाह के अवसर पर पहली बार अयोध्या में ढोलरू गायन हुआ था। तब से यह परंपरा हर वर्ष चैत्र मास में घर-घर जाकर नववर्ष की शुभकामनाएं देने के रूप में जीवित है।
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