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Chamba News: पांगी घाटी में उतरी देव रौनक, जुकारू ने जोड़े दिलों के तार
Thu, 26 Feb 2026 10:50 PM IST
शिमला ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, चम्बा
संवाद न्यूज एजेंसी, चम्बा
Updated Thu, 26 Feb 2026 10:50 PM IST
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जुकारू पर्व के चलते नोवालु उत्सव मनाते पांगीवासी। जागरूक पाठक
देव आस्था, लोक परंपराओं और सामूहिक उल्लास के रंग में रंगी घाटी
मिंधल गांव में रही मिंधल वासनी को समर्पित नवालु उत्सव की धूम
संवाद न्यूज एजेंसी
पांगी (चंबा)। जनजातीय क्षेत्र पांगी घाटी इन दिनों देव आस्था, लोक परंपराओं और सामूहिक उल्लास के रंग में रंगी है। गांव-गांव में जुकारू पर्व की गूंज के बीच मिंधल का नवालु उत्सव श्रद्धा और सांस्कृतिक गरिमा के साथ मनाया गया।
घाटी के गांव-गांव में पारंपरिक वेशभूषा, देव आस्था और सामूहिक उत्साह के साथ उत्सव मनाया जा रहा है। नवालु उत्सव भगवती मिंधल वासनी को समर्पित है। उत्सव के दौरान मां मिंधल वासनी के कारदार, मुख्य चेला, पुजारी और ग्रामीण मंदिर परिसर के समीप चिह्नित मेला पंडाल में एकत्रित हुए। विधि-विधान से विशेष पूजा-अर्चना की गई और पारंपरिक अनुष्ठानों का निर्वहन हुआ।
मिंधल निवासी 79 वर्षीय उदय चंद ने बताया कि यह परंपरा सदियों से चली आ रही है। जुकारू पर्व के दौरान पांगी घाटी की नौ पंचायतों शोर, थांदल, रेई, मिंधल, सहली, शुन, उद्दीन और चस्क में यह उत्सव मनाया जाता रहा है। बदलते समय के साथ कुछ पंचायतों में यह परंपरा अब कमजोर पड़ती नजर आ रही है। नवालु मेले को पंगवाली भाषा में तीन भागों या ‘तीन राग’ में विभाजित किया जाता है। प्रत्येक राग के अंतर्गत अलग-अलग परंपरागत ‘शेण’ लगाई जाती है। इसे मां भगवती की विशेष आराधना का प्रमुख अंग माना जाता है। मुख्य चेला करतार सिंह ने बताया कि जुकारू उत्सव का समापन किलाड़ के करयास में आयोजित होने वाले उनोडी उत्सव के साथ होता है। इसके बाद घाटी के लोग अपने दैनिक कार्यों में जुट जाते हैं। उन्होंने बताया कि उनोडी उत्सव के उपरांत पंगवाल समुदाय में गले मिलने की परंपरा निभाई जाती है। उत्सव के बाद यदि किसी घर में अतिथि आते हैं तो उन्हें ‘शून्यत’ के नाम पर विशेष पकवान परोसे जाते हैं। मां मिंधल वासनी के पुजारी भूपेंद्र शर्मा ने बताया कि जुकारू पर्व के समापन के साथ ही घाटी के किसान और बागवान खेती-बाड़ी में व्यस्त हो जाते हैं। मंगल उत्सव के बाद ही खेतों में हल चलाने का कार्य शुरू किया जाता है।
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मिंधल गांव में रही मिंधल वासनी को समर्पित नवालु उत्सव की धूम
संवाद न्यूज एजेंसी
पांगी (चंबा)। जनजातीय क्षेत्र पांगी घाटी इन दिनों देव आस्था, लोक परंपराओं और सामूहिक उल्लास के रंग में रंगी है। गांव-गांव में जुकारू पर्व की गूंज के बीच मिंधल का नवालु उत्सव श्रद्धा और सांस्कृतिक गरिमा के साथ मनाया गया।
घाटी के गांव-गांव में पारंपरिक वेशभूषा, देव आस्था और सामूहिक उत्साह के साथ उत्सव मनाया जा रहा है। नवालु उत्सव भगवती मिंधल वासनी को समर्पित है। उत्सव के दौरान मां मिंधल वासनी के कारदार, मुख्य चेला, पुजारी और ग्रामीण मंदिर परिसर के समीप चिह्नित मेला पंडाल में एकत्रित हुए। विधि-विधान से विशेष पूजा-अर्चना की गई और पारंपरिक अनुष्ठानों का निर्वहन हुआ।
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मिंधल निवासी 79 वर्षीय उदय चंद ने बताया कि यह परंपरा सदियों से चली आ रही है। जुकारू पर्व के दौरान पांगी घाटी की नौ पंचायतों शोर, थांदल, रेई, मिंधल, सहली, शुन, उद्दीन और चस्क में यह उत्सव मनाया जाता रहा है। बदलते समय के साथ कुछ पंचायतों में यह परंपरा अब कमजोर पड़ती नजर आ रही है। नवालु मेले को पंगवाली भाषा में तीन भागों या ‘तीन राग’ में विभाजित किया जाता है। प्रत्येक राग के अंतर्गत अलग-अलग परंपरागत ‘शेण’ लगाई जाती है। इसे मां भगवती की विशेष आराधना का प्रमुख अंग माना जाता है। मुख्य चेला करतार सिंह ने बताया कि जुकारू उत्सव का समापन किलाड़ के करयास में आयोजित होने वाले उनोडी उत्सव के साथ होता है। इसके बाद घाटी के लोग अपने दैनिक कार्यों में जुट जाते हैं। उन्होंने बताया कि उनोडी उत्सव के उपरांत पंगवाल समुदाय में गले मिलने की परंपरा निभाई जाती है। उत्सव के बाद यदि किसी घर में अतिथि आते हैं तो उन्हें ‘शून्यत’ के नाम पर विशेष पकवान परोसे जाते हैं। मां मिंधल वासनी के पुजारी भूपेंद्र शर्मा ने बताया कि जुकारू पर्व के समापन के साथ ही घाटी के किसान और बागवान खेती-बाड़ी में व्यस्त हो जाते हैं। मंगल उत्सव के बाद ही खेतों में हल चलाने का कार्य शुरू किया जाता है।
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