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Chamba News: चंबा नप के अध्यक्ष-उपाध्यक्ष की कुर्सी को खतरा
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चंबा। नगर परिषद चंबा की राजनीति में हटनाला वार्ड के पार्षद विजय कुमार के भाजपा में शामिल होने से सियासी हलचल तेज हो गई है। उनके इस फैसले से कांग्रेस समर्थित अध्यक्ष भुवनेश्वरी गुलाटी और उपाध्यक्ष जितेंद्र सूर्या के सामने राजनीतिक चुनौती बढ़ गई है। नगर परिषद में बदले समीकरणों के बीच अब दोनों दलों की रणनीति पर निगाहें टिक गई हैं। नगर परिषद के 11 वार्डों में कांग्रेस और भाजपा समर्थित पांच-पांच पार्षद जीते थे, जबकि विजय कुमार की भूमिका निर्णायक रही थी। जून में अध्यक्ष और उपाध्यक्ष पद के चुनाव में कांग्रेस समर्थित उम्मीदवारों को सात-सात मत मिले थे, जबकि भाजपा समर्थित उम्मीदवारों को पांच-पांच मत प्राप्त हुए थे। अब विजय कुमार के भाजपा में शामिल होने से दोनों दलों के समर्थित पार्षदों की संख्या पांच-पांच हो गई है। विजय कुमार ने भाजपा में शामिल होने के पीछे नगर परिषद अध्यक्ष और उपाध्यक्ष से अपेक्षित सहयोग नहीं मिलने की बात कही है। उनका आरोप है कि सदर विधायक से उन्हें सहयोग मिलता रहा, लेकिन नगर परिषद के शीर्ष पदाधिकारियों ने उन्हें नजरअंदाज किया। इसी नाराजगी के चलते उन्होंने भाजपा का दामन थामने का फैसला लिया।
सत्ता के समीकरणों पर नजर
विजय कुमार के पाला बदलने से भाजपा को नगर परिषद में अपना समर्थन बढ़ाने का अवसर मिला है, जबकि कांग्रेस समर्थित नेतृत्व के सामने पार्षदों के बीच तालमेल बनाए रखने की चुनौती खड़ी हुई है। अध्यक्ष और उपाध्यक्ष पदों पर संभावित बदलाव को लेकर राजनीतिक चर्चाएं तेज हैं। हालांकि, केवल पार्षदों की संख्या बराबर होने से पदों पर बदलाव तय नहीं होता। इसके लिए नियमानुसार प्रक्रिया और पार्षदों का समर्थन महत्वपूर्ण होगा। अब देखना होगा कि आने वाले दिनों में नगर परिषद की राजनीति क्या करवट लेती है। नियमों के अनुसार एक साल तक कांग्रेस की नगर परिषद रहना तय है। इसके बाद भाजपा समर्थित पार्षद बदलाव कर सकते हैं।
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सत्ता के समीकरणों पर नजर
विजय कुमार के पाला बदलने से भाजपा को नगर परिषद में अपना समर्थन बढ़ाने का अवसर मिला है, जबकि कांग्रेस समर्थित नेतृत्व के सामने पार्षदों के बीच तालमेल बनाए रखने की चुनौती खड़ी हुई है। अध्यक्ष और उपाध्यक्ष पदों पर संभावित बदलाव को लेकर राजनीतिक चर्चाएं तेज हैं। हालांकि, केवल पार्षदों की संख्या बराबर होने से पदों पर बदलाव तय नहीं होता। इसके लिए नियमानुसार प्रक्रिया और पार्षदों का समर्थन महत्वपूर्ण होगा। अब देखना होगा कि आने वाले दिनों में नगर परिषद की राजनीति क्या करवट लेती है। नियमों के अनुसार एक साल तक कांग्रेस की नगर परिषद रहना तय है। इसके बाद भाजपा समर्थित पार्षद बदलाव कर सकते हैं।
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