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ढोलरू परिवारों ने लोकगीतों से किया विक्रमी संवत का आगाज
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चंबा। जिला मुख्यालय में विक्रमी संवत के नए साल का आगाज ढोलरू परिवारों ने लोकगीत गाकर शुरू किया। इस मौके पर घर-घर जाकर उन्होंने ढोलकों की थाप पर परंपरागत लोकगीत गाकर विक्रमी संवत 2076 का शुभारंभ किया। सदियों से यह परिवार इस पारिवारिक परंपरा को निभा रहे हैं। ढोलरू परिवार के धर्म चंद ने ढोलरू के रूप में गीत गाकर बताया कि पहले हमारे पूर्वज इस काम को करते थे और अब हम इस परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं।
वहीं, स्थानीय बजुर्गों का कहना है कि ढोलरू के मुख से लोकगीत के माध्यम से चैत्र माह का नाम सुनना अति शुभ माना जाता है। ढोलरू परिवार से संबंध रखने वाले धर्म चंद ने बताया कि वह मिस्त्री का काम करता है, लेकिन यहां उसके आने का उद्देश्य अपनी पारिवारिक परंपरा को निभाना है। चैत्र का नाम गीत को एक प्रकार का भजन और ईश्वर वंदना ही माना जाता है।
ढोलरू ढोल की थाप पर चैत्र माह में आई बसंत-बहार का व्याख्यान करते हुए गाते हैं कि किस प्रकार इस मोहित कर देने वाले मौसम में मनुष्यों के साथ-साथ पशु-पक्षी और पेड़-पौधे भी प्रसन्नता, उल्लास उमंग के साथ झूम उठते हैं। वीरवार को चैत्र माह का नाम सुनने के उपरांत स्थानीय लोग उन्हें नये या पुराने वस्त्र, गुड़, आटा और दक्षिणा देकर खुशी-खुशी विदा करके आगामी वर्ष को आने का न्योता देते हैं।
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वहीं, स्थानीय बजुर्गों का कहना है कि ढोलरू के मुख से लोकगीत के माध्यम से चैत्र माह का नाम सुनना अति शुभ माना जाता है। ढोलरू परिवार से संबंध रखने वाले धर्म चंद ने बताया कि वह मिस्त्री का काम करता है, लेकिन यहां उसके आने का उद्देश्य अपनी पारिवारिक परंपरा को निभाना है। चैत्र का नाम गीत को एक प्रकार का भजन और ईश्वर वंदना ही माना जाता है।
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ढोलरू ढोल की थाप पर चैत्र माह में आई बसंत-बहार का व्याख्यान करते हुए गाते हैं कि किस प्रकार इस मोहित कर देने वाले मौसम में मनुष्यों के साथ-साथ पशु-पक्षी और पेड़-पौधे भी प्रसन्नता, उल्लास उमंग के साथ झूम उठते हैं। वीरवार को चैत्र माह का नाम सुनने के उपरांत स्थानीय लोग उन्हें नये या पुराने वस्त्र, गुड़, आटा और दक्षिणा देकर खुशी-खुशी विदा करके आगामी वर्ष को आने का न्योता देते हैं।
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