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जहां सत्संग है, वहीं सत्य है, सत्य से बड़ा कोई धर्म नहीं : भारद्वाज
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- भटोली गांव में कलशयात्रा के साथ हुआ श्रीमद्भागवत कथा का शुभारंभ
संवाद न्यूज एजेंसी
बिलासपुर। उपमंडल घुमारवीं के भटोली गांव में श्रीमद्भागवत कथा का शुभारंभ कलश यात्रा से हुआ। कथा वाचन पंडित सुरेश भारद्वाज कर रहे हैं। प्रथम दिन कलश यात्रा के साथ पावन श्रीमद्भागवत कथा ग्रंथ को सादर आयोजन स्थल तक लाया गया।
कथा वाचक पंडित सुरेश भारद्वाज ने पहले दिन सत्संग का महत्व बताया। कहा कि जहां सत्संग है, वहीं सत्य है। सत्य से बड़ा कोई धर्म नहीं है। इस अवसर पर उन्होंने सत्यवादी राजा हरिश्चंद्र का प्रसंग सुनाया। सत्य की चर्चा जब भी कहीं की जाएगी, हरीश चंद्र का नाम जरूर लिया जाएगा। उन्होंने सत्य के मार्ग पर चलने के लिए अपनी पत्नी और पुत्र के साथ खुद को बेच दिया था। उनकी पत्नी का नाम तारा था, एक बार राजा ने सपना देखा कि उन्होंने अपना सारा राजपाट विश्वामित्र को दान में दे दिया है। अगले दिन जब विश्वामित्र उनके महल में आए तो उन्होंने विश्वामित्र को सारा हाल सुनाया और साथ ही अपना राज्य उन्हें सौंप दिया। जाते-जाते विश्वामित्र ने राजा हरिश्चंद्र से पांच सौ स्वर्ण मुद्राएं दान में मांगी। विश्वामित्र ने राजा को याद दिलाया कि राजपाट के साथ राज्य का कोष भी वे दान कर चुके हैं और दान की हुई वस्तु को दोबारा दान नहीं किया जाता। तब राजा ने अपनी पत्नी और पुत्र को बेचकर स्वर्ण मुद्राएं हासिल कीं, लेकिन वो भी पांच सौ नहीं हो पाईं। राजा हरिश्चंद्र ने खुद को भी बेच डाला और सोने की सभी मुद्राएं विश्वामित्र को दान में दे दीं। अपनी मर्यादा को निभाया।
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संवाद न्यूज एजेंसी
बिलासपुर। उपमंडल घुमारवीं के भटोली गांव में श्रीमद्भागवत कथा का शुभारंभ कलश यात्रा से हुआ। कथा वाचन पंडित सुरेश भारद्वाज कर रहे हैं। प्रथम दिन कलश यात्रा के साथ पावन श्रीमद्भागवत कथा ग्रंथ को सादर आयोजन स्थल तक लाया गया।
कथा वाचक पंडित सुरेश भारद्वाज ने पहले दिन सत्संग का महत्व बताया। कहा कि जहां सत्संग है, वहीं सत्य है। सत्य से बड़ा कोई धर्म नहीं है। इस अवसर पर उन्होंने सत्यवादी राजा हरिश्चंद्र का प्रसंग सुनाया। सत्य की चर्चा जब भी कहीं की जाएगी, हरीश चंद्र का नाम जरूर लिया जाएगा। उन्होंने सत्य के मार्ग पर चलने के लिए अपनी पत्नी और पुत्र के साथ खुद को बेच दिया था। उनकी पत्नी का नाम तारा था, एक बार राजा ने सपना देखा कि उन्होंने अपना सारा राजपाट विश्वामित्र को दान में दे दिया है। अगले दिन जब विश्वामित्र उनके महल में आए तो उन्होंने विश्वामित्र को सारा हाल सुनाया और साथ ही अपना राज्य उन्हें सौंप दिया। जाते-जाते विश्वामित्र ने राजा हरिश्चंद्र से पांच सौ स्वर्ण मुद्राएं दान में मांगी। विश्वामित्र ने राजा को याद दिलाया कि राजपाट के साथ राज्य का कोष भी वे दान कर चुके हैं और दान की हुई वस्तु को दोबारा दान नहीं किया जाता। तब राजा ने अपनी पत्नी और पुत्र को बेचकर स्वर्ण मुद्राएं हासिल कीं, लेकिन वो भी पांच सौ नहीं हो पाईं। राजा हरिश्चंद्र ने खुद को भी बेच डाला और सोने की सभी मुद्राएं विश्वामित्र को दान में दे दीं। अपनी मर्यादा को निभाया।
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