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Bilaspur News: चने की बिजाई के लिए 5 से 25 नवंबर तक उपयुक्त समय
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-चने की एचसी-2,एचपीजी-17, हिम पालम-1 किस्म उपयुक्त
-एक बीघा में हो सकती है 70 किलोग्राम की पैदावार
संवाद न्यूज एजेंसी
जुखाला (बिलासपुर)। जिले में 5 से 25 नवंबर तक चने की बिजाई के लिए उपयुक्त समय है। किसान इस दौरान बिजाई का कार्य पूरा कर सकते हैं। जिले में चने की एचसी-2, एचपीजी-17 और हिम पालम-1 अच्छी पैदावार देने वाली किस्म है। यह जानकारी कृषि विज्ञान केंद्र बरठीं के मृदा विभाग के वैज्ञानिक डॉ. गौरव ने दी।
उन्होंने बताया कि यह एक बीघा में 60-70 किलोग्राम चने की पैदावार देती है। एचसी-2 बारीक दाने का चना होता है और इसके बीज की मात्रा तीन किलोग्राम प्रति बीघा होती है। एचपीजी-17 का दाना मोटा होता है और इसके बीज की मात्रा एक बीघा में छह किलोग्राम पड़ती है। जिले में चने की 30 हेक्टेयर पर चने की खेती होती है और करीब 40 मीट्रिक टन पैदावार होती है। बुवाई के लिए किसान खेत की तैयारी कर लें। चने की फसल के लिए मिट्टी को ज्यादा बारीक करने की जरूरत नहीं होती है। इस के लिए भुरभुरी मिट्टी की जरूरत होती है, ताकि पौधों की जड़ों में वायु का आदान प्रदान होता रहे। चने की फसल में गोबर की गली सड़ी खाद एक टन प्रति बीघा डालें। इसके लिए यूरिया की जरूरत नहीं होती है। चने की फसल को लाइनों में बीजा जा सकता है। इसके लिए लाइन से लाइन की दूरी एक फीट और पौधे से पौधे की दूरी 10-12 सेंटीमीटर रखनी चाहिए। चने के बीज को 7- 8 सेंटीमीटर की गहराई तक बीजना चाहिए। अगर इससे कम गहराई पर बीज जाता है तो उखड़ा रोग लगने के कारण इसके पौधे सूख जाते हैं। अगर चने को गेहूं के साथ बीजा जाता है तो चार लाइन गेहूं और दो लाइन चने की बिजाई करनी चाहिए। इससे यह गेहूं की फसल के लिए नाइट्रोजन का संग्रह भी करेगा और गेहूं की पैदावार में बढ़ोतरी होगी। चने का पौधा अपनी जड़ों में नाइट्रोजन का संग्रह करता है। इसकी जड़ों की गांठों में राइजोबियम नामक बैक्टीरिया होता है जो कि वातावरण से नाइट्रोजन इकट्ठा करता है। चने के पौधों में फली छेदक कीड़ा लगता है। इसकी रोकथाम के लिए किसान नीम युक्त कीटनाशक का प्रयोग करें या लेमड़ा नामक दवाई 15 लीटर पानी में आठ एमएल का घोल बना कर फसल में 50 प्रतिशत फूल आने की अवस्था में और इसके 15-20 दिन बाद छिड़काव करें।
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-एक बीघा में हो सकती है 70 किलोग्राम की पैदावार
संवाद न्यूज एजेंसी
जुखाला (बिलासपुर)। जिले में 5 से 25 नवंबर तक चने की बिजाई के लिए उपयुक्त समय है। किसान इस दौरान बिजाई का कार्य पूरा कर सकते हैं। जिले में चने की एचसी-2, एचपीजी-17 और हिम पालम-1 अच्छी पैदावार देने वाली किस्म है। यह जानकारी कृषि विज्ञान केंद्र बरठीं के मृदा विभाग के वैज्ञानिक डॉ. गौरव ने दी।
उन्होंने बताया कि यह एक बीघा में 60-70 किलोग्राम चने की पैदावार देती है। एचसी-2 बारीक दाने का चना होता है और इसके बीज की मात्रा तीन किलोग्राम प्रति बीघा होती है। एचपीजी-17 का दाना मोटा होता है और इसके बीज की मात्रा एक बीघा में छह किलोग्राम पड़ती है। जिले में चने की 30 हेक्टेयर पर चने की खेती होती है और करीब 40 मीट्रिक टन पैदावार होती है। बुवाई के लिए किसान खेत की तैयारी कर लें। चने की फसल के लिए मिट्टी को ज्यादा बारीक करने की जरूरत नहीं होती है। इस के लिए भुरभुरी मिट्टी की जरूरत होती है, ताकि पौधों की जड़ों में वायु का आदान प्रदान होता रहे। चने की फसल में गोबर की गली सड़ी खाद एक टन प्रति बीघा डालें। इसके लिए यूरिया की जरूरत नहीं होती है। चने की फसल को लाइनों में बीजा जा सकता है। इसके लिए लाइन से लाइन की दूरी एक फीट और पौधे से पौधे की दूरी 10-12 सेंटीमीटर रखनी चाहिए। चने के बीज को 7- 8 सेंटीमीटर की गहराई तक बीजना चाहिए। अगर इससे कम गहराई पर बीज जाता है तो उखड़ा रोग लगने के कारण इसके पौधे सूख जाते हैं। अगर चने को गेहूं के साथ बीजा जाता है तो चार लाइन गेहूं और दो लाइन चने की बिजाई करनी चाहिए। इससे यह गेहूं की फसल के लिए नाइट्रोजन का संग्रह भी करेगा और गेहूं की पैदावार में बढ़ोतरी होगी। चने का पौधा अपनी जड़ों में नाइट्रोजन का संग्रह करता है। इसकी जड़ों की गांठों में राइजोबियम नामक बैक्टीरिया होता है जो कि वातावरण से नाइट्रोजन इकट्ठा करता है। चने के पौधों में फली छेदक कीड़ा लगता है। इसकी रोकथाम के लिए किसान नीम युक्त कीटनाशक का प्रयोग करें या लेमड़ा नामक दवाई 15 लीटर पानी में आठ एमएल का घोल बना कर फसल में 50 प्रतिशत फूल आने की अवस्था में और इसके 15-20 दिन बाद छिड़काव करें।
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