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Bilaspur News: मंडी मानवा में जमीन सेटलमेंट पर विवाद गहराया
Fri, 20 Mar 2026 11:47 PM IST
शिमला ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, बिलासपुर
संवाद न्यूज एजेंसी, बिलासपुर
Updated Fri, 20 Mar 2026 11:47 PM IST
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बाहरी लोगों के नाम सामने आने से ग्रामीणों में आक्रोश
भाखड़ा विस्थापित परिवारों ने उठाई उच्च स्तरीय जांच की मांग
डीजीपीएस निशानदेही में रिकॉर्ड से बाहर के दावों ने बढ़ाई चिंता
संवाद न्यूज एजेंसी
बिलासपुर। सदर विधानसभा क्षेत्र की ग्राम पंचायत नौणी के अंतर्गत गांव मंडी मानवा में इन दिनों चल रहे जमीन सेटलमेंट कार्य को लेकर बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। ग्रामीणों का कहना है कि सेटलमेंट के दौरान ऐसे लोगों के नाम भी जमीन रिकॉर्ड में सामने आ रहे हैं, जो लंबे समय पहले अन्य स्थानों पर जाकर बस चुके हैं। इस स्थिति से गांव में रह रहे भाखड़ा विस्थापित परिवारों में भारी रोष व्याप्त है।
भाखड़ा डैम विस्थापित सभा मंडी मानवा के अध्यक्ष रमेश चंद कौंडल के नेतृत्व में सैकड़ों ग्रामीणों ने इस मामले में उच्च स्तरीय जांच की मांग उठाई है। उनके साथ पूर्व पंचायत सदस्य, सेवानिवृत्त अधिकारी और अन्य स्थानीय लोगों ने प्रशासन के समक्ष अपनी चिंता जाहिर की है। ग्रामीणों का कहना है कि उच्च न्यायालय हिमाचल प्रदेश के आदेशानुसार गांव में जमीन सेटलमेंट का कार्य चल रहा है। इस दौरान डीजीपीएस मशीन के माध्यम से जमीन की निशानदेही की जा रही है। सेटलमेंट टीम द्वारा पुराने रिकॉर्ड के आधार पर जमीन का मिलान किया जा रहा है, लेकिन इसी प्रक्रिया में कई ऐसे नाम सामने आए हैं, जो वर्तमान में गांव में निवास नहीं करते। बताया कि भाखड़ा डैम निर्माण के समय बिलासपुर और आसपास के क्षेत्रों के हजारों परिवार विस्थापित हुए थे। इन प्रभावित परिवारों को बसाने के लिए मंडी मानवा की भूमि का चयन किया गया था। तत्कालीन प्रशासन ने आपात स्थिति में प्रभावित परिवारों की सूची तैयार कर उन्हें यहां जमीन आवंटित की थी। उस समय परिवारों को यह भी छूट दी गई थी कि वे अपनी सुविधा अनुसार अन्य स्थानों पर भी बस सकते हैं। ग्रामीणों के अनुसार, इसी छूट का फायदा उठाकर कुछ लोगों ने अलग-अलग स्थानों पर अपने नाम दर्ज करवा लिए। हालांकि उन्होंने मंडी मानवा में कभी कब्जा नहीं किया, लेकिन अब सेटलमेंट के दौरान उनके नाम रिकॉर्ड में दिखाए जा रहे हैं, जिससे वर्तमान में रह रहे परिवारों के अधिकारों पर संकट खड़ा हो गया है।
गांव के लोगों का कहना है कि वर्तमान में यहां भाखड़ा विस्थापित परिवारों की चौथी और पांचवीं पीढ़ी निवास कर रही है। समय के साथ परिवारों की संख्या में कई गुना वृद्धि हो चुकी है, जबकि जमीन उतनी ही सीमित है, जितनी शुरूआत में आवंटित की गई थी। कई परिवारों को जो अतिरिक्त भूमि दी गई थी, वह दूरस्थ और जंगल क्षेत्रों में स्थित है, जहां बसना लगभग असंभव है। ऐसे में ग्रामीणों ने अपने घरों के आसपास की उपलब्ध जमीन पर ही अपना जीवन-यापन स्थापित किया है। अब जब सेटलमेंट के दौरान बाहरी लोगों के प्लॉट और जमीन रिकॉर्ड में दर्शाए जा रहे हैं, तो स्थानीय लोगों को अपने घर और जमीन खोने का भय सताने लगा है। प्रदेश सरकार और जिला प्रशासन से मांग की है कि मंडी मानवा में जमीन सेटलमेंट के दौरान सामने आ रहे बाहरी दावों की निष्पक्ष और उच्च स्तरीय जांच करवाई जाए। साथ ही यह भी सुनिश्चित किया जाए कि जिन लोगों को पहले ही अन्य स्थानों पर जमीन आवंटित हो चुकी है, उनकी इस गांव में दावेदारी को रद्द किया जाए। इसके अतिरिक्त ग्रामीणों ने मांग की है कि गांव में घरों के आसपास मौजूद सरकारी भूमि को वर्तमान में निवास कर रहे भाखड़ा विस्थापित परिवारों की पीढ़ियों के नाम नियमित किया जाए, ताकि उन्हें भविष्य में किसी प्रकार की कानूनी या प्रशासनिक परेशानी का सामना न करना पड़े। ग्रामीणों ने चेतावनी दी है कि यदि उनकी मांगों पर शीघ्र कार्रवाई नहीं की गई, तो वे आंदोलन का रास्ता अपनाने को मजबूर होंगे।
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भाखड़ा विस्थापित परिवारों ने उठाई उच्च स्तरीय जांच की मांग
डीजीपीएस निशानदेही में रिकॉर्ड से बाहर के दावों ने बढ़ाई चिंता
संवाद न्यूज एजेंसी
बिलासपुर। सदर विधानसभा क्षेत्र की ग्राम पंचायत नौणी के अंतर्गत गांव मंडी मानवा में इन दिनों चल रहे जमीन सेटलमेंट कार्य को लेकर बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। ग्रामीणों का कहना है कि सेटलमेंट के दौरान ऐसे लोगों के नाम भी जमीन रिकॉर्ड में सामने आ रहे हैं, जो लंबे समय पहले अन्य स्थानों पर जाकर बस चुके हैं। इस स्थिति से गांव में रह रहे भाखड़ा विस्थापित परिवारों में भारी रोष व्याप्त है।
भाखड़ा डैम विस्थापित सभा मंडी मानवा के अध्यक्ष रमेश चंद कौंडल के नेतृत्व में सैकड़ों ग्रामीणों ने इस मामले में उच्च स्तरीय जांच की मांग उठाई है। उनके साथ पूर्व पंचायत सदस्य, सेवानिवृत्त अधिकारी और अन्य स्थानीय लोगों ने प्रशासन के समक्ष अपनी चिंता जाहिर की है। ग्रामीणों का कहना है कि उच्च न्यायालय हिमाचल प्रदेश के आदेशानुसार गांव में जमीन सेटलमेंट का कार्य चल रहा है। इस दौरान डीजीपीएस मशीन के माध्यम से जमीन की निशानदेही की जा रही है। सेटलमेंट टीम द्वारा पुराने रिकॉर्ड के आधार पर जमीन का मिलान किया जा रहा है, लेकिन इसी प्रक्रिया में कई ऐसे नाम सामने आए हैं, जो वर्तमान में गांव में निवास नहीं करते। बताया कि भाखड़ा डैम निर्माण के समय बिलासपुर और आसपास के क्षेत्रों के हजारों परिवार विस्थापित हुए थे। इन प्रभावित परिवारों को बसाने के लिए मंडी मानवा की भूमि का चयन किया गया था। तत्कालीन प्रशासन ने आपात स्थिति में प्रभावित परिवारों की सूची तैयार कर उन्हें यहां जमीन आवंटित की थी। उस समय परिवारों को यह भी छूट दी गई थी कि वे अपनी सुविधा अनुसार अन्य स्थानों पर भी बस सकते हैं। ग्रामीणों के अनुसार, इसी छूट का फायदा उठाकर कुछ लोगों ने अलग-अलग स्थानों पर अपने नाम दर्ज करवा लिए। हालांकि उन्होंने मंडी मानवा में कभी कब्जा नहीं किया, लेकिन अब सेटलमेंट के दौरान उनके नाम रिकॉर्ड में दिखाए जा रहे हैं, जिससे वर्तमान में रह रहे परिवारों के अधिकारों पर संकट खड़ा हो गया है।
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गांव के लोगों का कहना है कि वर्तमान में यहां भाखड़ा विस्थापित परिवारों की चौथी और पांचवीं पीढ़ी निवास कर रही है। समय के साथ परिवारों की संख्या में कई गुना वृद्धि हो चुकी है, जबकि जमीन उतनी ही सीमित है, जितनी शुरूआत में आवंटित की गई थी। कई परिवारों को जो अतिरिक्त भूमि दी गई थी, वह दूरस्थ और जंगल क्षेत्रों में स्थित है, जहां बसना लगभग असंभव है। ऐसे में ग्रामीणों ने अपने घरों के आसपास की उपलब्ध जमीन पर ही अपना जीवन-यापन स्थापित किया है। अब जब सेटलमेंट के दौरान बाहरी लोगों के प्लॉट और जमीन रिकॉर्ड में दर्शाए जा रहे हैं, तो स्थानीय लोगों को अपने घर और जमीन खोने का भय सताने लगा है। प्रदेश सरकार और जिला प्रशासन से मांग की है कि मंडी मानवा में जमीन सेटलमेंट के दौरान सामने आ रहे बाहरी दावों की निष्पक्ष और उच्च स्तरीय जांच करवाई जाए। साथ ही यह भी सुनिश्चित किया जाए कि जिन लोगों को पहले ही अन्य स्थानों पर जमीन आवंटित हो चुकी है, उनकी इस गांव में दावेदारी को रद्द किया जाए। इसके अतिरिक्त ग्रामीणों ने मांग की है कि गांव में घरों के आसपास मौजूद सरकारी भूमि को वर्तमान में निवास कर रहे भाखड़ा विस्थापित परिवारों की पीढ़ियों के नाम नियमित किया जाए, ताकि उन्हें भविष्य में किसी प्रकार की कानूनी या प्रशासनिक परेशानी का सामना न करना पड़े। ग्रामीणों ने चेतावनी दी है कि यदि उनकी मांगों पर शीघ्र कार्रवाई नहीं की गई, तो वे आंदोलन का रास्ता अपनाने को मजबूर होंगे।
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