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टूटा वर्षों का इतिहास, पज्याल जख मेला रद्द

Sun, 23 Aug 2020 11:42 PM IST
Shimla	 Bureau शिमला ब्यूरो
Updated Sun, 23 Aug 2020 11:42 PM IST
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History of broken years, Pazyal Zakh fair canceled
बरठीं (बिलासपुर)। विकास खंड झंडूता की ग्राम पंचायत बड़गांव सहित आसपास के क्षेत्र के आराध्य देवता पज्याल जख गुग्गा जाहरवीर के नाम से चलने वाले पांच दिवसीय मेलों पर भी कोरोना का साया दिखा है। लगभग पच्चासी वर्षों के इतिहास में पहली बार शुभारंभ गुग्गा जाहरवीर की सिर्फ पूजा-अर्चना तक ही संपन्न करना पड़ा है। जबकि मेले के आयोजन को निरस्त कर दिया गया है। इससे यहां पर बाहरी राज्यों से आए करीब दौ सौ कारोबारियों के समक्ष रोजी-रोटी का संकट खड़ा हो गया है। बताया जाता है कि गुग्गा मेला की संस्कृति 86 वर्ष पुरानी है। जो आज तक पूर्व की परंपरा पर चली आ रही थी।
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बता दें कि इस मेलों का ग्रामीण बेसब्री से इंतजार करते थे और पांच दिवसीय मेलों में खूब लुप्त उठाकर सामान की खरीदारी करते थे। लेकिन कोविड-19 के चलते पंचायत समिति सदस्य चिरंजी लाल, पंचायत उपप्रधान रमेश चंद सहित अन्य सदस्यों की उपस्थिति में पूजा अर्चना कर मेलों की औपचारिकता पत्थर चौथ को पूरी कर ली गई है।
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गौरतलब है कि गुग्गा मेला की संस्कृति लगभग 86 वर्ष पुरानी है और यह मेला गणेश चतुर्थी पत्थर चौथ से शुरू होता है। बड़गांव पंचायत ग्रामीणों के अलावा आसपास की पंचायतों के हजारों मेला प्रेमी मेले में पहुंच कर जहां सामान की खरीदारी करते हैं वहीं मेले की शोभा को भी बढ़ाते हैं। बुजुर्गों की माने तो लगभग आठ दशक पहले इन मेलों का शुभारंभ किया गया था। कांगड़ा की तरफ के कुछ लोग अपने गांव में गुग्गा जाहरवीर की स्थापना के लिए राजस्थान के गुग्गा मडी से गुग्गा की सीमेंट की बनी मूर्ति को लेकर आए थे। कई दिनों की पैदल यात्रा के बाद एक रात्रि का पड़ाव बडगांव में किया गया और जब वह लोग दूसरे दिन गुग्गा की प्रतिमा को वहां से उठाने लगे तो वह देवता वहां से हिल भी न पाया। इससे गुग्गा की मूर्ति वहीं स्थापित हो गई। उसके बाद इस स्थान का नाम पज्याल के नाम से मशहूर हुआ। जहां पर मंदिर बनाया गया है।
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जख की महिमा
जख गुग्गा की महिमा के बारे में कहा जाता है कि यदि किसी की भैंस के दूध, मक्खन या लस्सी में कीड़े पड़ जाते हैं तो ग्रामीण अपनी भैंस का पहला दूध, लस्सी और घी गुग्गा मंदिर में चढ़ाते हैं और उनको कीड़ों से छुटकारा मिल जाता है। मेलों में दूर-दूर से व्यापारी अपना व्यापार करने के हैं और बडे ही सौहार्दपूर्ण वातावरण में मेलों में हर प्रकार की दुकानें लगाकर मेले की रौनक को दो गुणा कर देते हैं। लगभग दो सौ व्यापारी मेलों में छोटे बड़े झूले, मिठाईयों की दुकानों सहित मनियारी व रेडीमेट का व्यापार करते हैं। लेकिन कोरोना के चलते सभी घुमंतु व्यापारियों पर दोहरी मार पड़ रही है। जहां मेले बंद हैं। वहीं उनकी दुकानदारी भी बंद हो गई है। जिस कारण उनके परिवार का पालन पोषण भी सकते में आ गया है।
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