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विभाग बीस साल तक सर्वे करने की पूरी करते रहे औपचारिकता

Sun, 15 Mar 2020 10:15 PM IST
Shimla	 Bureau शिमला ब्यूरो
Updated Sun, 15 Mar 2020 10:15 PM IST
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बिलासपुर। साल 2000 से शुरू हुआ बिलासपुर के हरनोड़ा गांव में मानसिक रूप से जन्म लेने वाले बच्चों का सिलसिला जहां जिला प्रशासन और चिकित्सा के क्षेत्र से जुड़े लोगों के लिए चिंता का विषय है वहीं ऐसे बच्चों पर ग्राउंड रिपोर्ट तैयार करने वाले विभागों, उनके कर्मचारियों और इस रिपोर्ट को पढ़ने वाले अधिकारियों की लापरवाही भी सामने आती है।
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इस क्षेत्र में लगातार मानसिक रूप से कमजोर बच्चे पैदा होते रहे लेकिन किसी भी अधिकारी ने इस तरफ ध्यान ही नहीं दिया कि इसकी वजह पता की जाए। इस बात से साबित होता है कि विभागीय अधिकारी सर्वे कर सिर्फ खानापूर्ति करते हैं। सवाल यह भी उठ रहा है कि आज तक जो सर्वे विभागों की ओर से किए जाते रहे वह क्या बंद कमरों में तैयार किए गए हैं? अगर ग्राउंड स्तर पर सर्वे हुआ है तो फिर यह बच्चे कैसे छूट गए?
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हरनोड़ा गांव के कुलदीप, जसपाल, पवन, श्यामलाल, मोहिंद्र सहित अन्यों का कहना है कि हर साल बाल विभाग और स्वास्थ्य विभाग की तरफ से ऐसे बच्चों को सर्वे किया जाता है। आंगनबाड़ी और स्कूलों के माध्यम से इनकी सूची तैयार की जाती है लेकिन सभी संबंधित विभागों ने सिर्फ सूची बनाकर अपनी जिम्मेवारी पूरी की है। किसी ने भी ऐसे मामलों की असली वजह तक पहुंचने की जहमत नहीं उठाई। इतने बड़े मामले को इस तरह अनदेखा करना विभागों की लापरवाही के स्तर को दर्शाती है।
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मामले की जांच बड़े स्तर पर होना जरूरी
आंगनबाड़ी केंद्रों से लेकर स्वास्थ्य विभाग तक सभी की ओर से सालाना विशेष बच्चों पर रिपोर्ट तैयार की जाती है। वहीं विशेष बच्चों के आईक्यू लेवल को चेक किया जाता है। अगर यह सामान्य नहीं पाया जाए तो बच्चों को स्पेशल बच्चों में शामिल किया जाता है। वहीं एक ही गांव में इतने बच्चों का मानसिक स्तर पर कमजोर होना सामान्य नहीं है। बच्चों के मानसिक तौर पर कमजोर होने के कई कारण हो सकते हैं। बच्चों की जांच के बाद ही सही कारणों का पता लगाया जा सकता है। वहीं बच्चों की रिपोर्ट मिलने के बाद इस पर विभाग संजीदा क्यों नहीं हुआ कुछ कहा नहीं जा सकता है लेकिन यह एक बड़ा मामला है और इसकी जांच बड़े स्तर पर जरूरी है।
डॉ.प्रवीण एस भाटिया, रजिस्टार न्यूरोसर्जरी विभाग आईजीएमसी शिमला
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