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Bilaspur News: दुष्टों के संहार के लिए धरती पर जन्म लते हैं भगवान

Sat, 25 May 2024 11:28 PM IST
Shimla Bureau शिमला ब्यूरो
Updated Sat, 25 May 2024 11:28 PM IST
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God is born on earth to destroy the wicked.
श्रीमद्भागवत कथा में सुनाई भगवान श्रीकृष्ण की जन्म कथा
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संवाद न्यूज एजेंसी
बिलासपुर। ग्राम पंचायत औहर में चल रही श्रीमद्भागवत कथा के चौथे दिन प्रवचनों की अमृत वर्षा करते हुए पंडित बृजेश गोस्वामी ने भगवान श्रीकृष्ण जन्म कथा का प्रसंग सुनाया। उन्होंने कहा कि जब-जब धरती पर अत्याचार बढ़ता है तो दुष्टों के संहार के लिए भगवान किसी न किसी रूप में अवतार लेते हैं।

घनघोर अंधेरी रात को रोहिणी नक्षत्र में मथुरा के कारागार में वासुदेव की पत्नी देवकी के गर्भ से भगवान श्रीकृष्ण ने जन्म लिया। द्वापर युग में भोजवंशी राजा उग्रसेन मथुरा में राज्य करते थे। उसके आततायी पुत्र कंस ने उन्हें गद्दी से उतार दिया और स्वयं मथुरा का राजा बन बैठा। कंस की एक बहन देवकी थी, जिसका विवाह वासुदेव नामक यदुवंशी सरदार से हुआ था। एक समय कंस अपनी बहन देवकी को उसकी ससुराल पहुंचाने जा रहा था। रास्ते में आकाशवाणी हुई कि हे कंस, जिस देवकी को तू बड़े प्रेम से ले जा रहा है, उसी के गर्भ में तेरा काल जन्म लेगा। इसी के गर्भ से उत्पन्न आठवां बालक तेरा वध करेगा। यह सुनकर कंस वासुदेव को मारने के लिए उद्धेलित हुआ। तब देवकी ने उससे विनयपूर्वक कहा मेरे गर्भ से जो संतान होगी, उसे मैं तुम्हारे सामने ला दूंगी। बहनोई को मारने से क्या लाभ है। कंस ने देवकी की बात मान ली और मथुरा वापस चला आया। उसने वासुदेव और देवकी को कारागार में डाल दिया। वासुदेव देवकी के सात बच्चे हुए और सातों को जन्म लेते ही कंस ने मार डाला। अब आठवां बच्चा होने वाला था। कारागार में उन पर कड़े पहरे बैठा दिए गए। उसी समय नंद की पत्नी यशोदा को भी बच्चा होने वाला था। उन्होंने वासुदेव देवकी के दुखी जीवन को देख आठवें बच्चे की रक्षा का उपाय रचा। जिस समय देवकी को पुत्र पैदा हुआ, उसी समय संयोग से यशोदा के गर्भ से एक कन्या का जन्म हुआ जो और कुछ नहीं सिर्फ माया थी। जिस कोठरी में देवकी वासुदेव कैद थे, उसमें अचानक प्रकाश हुआ और उनके सामने शंख, चक्र, गदा, पद्म धारण किए चतुर्भुज भगवान प्रकट हुए। दोनों भगवान के चरणों में गिर पड़े। तब भगवान ने उनसे कहा अब मैं पुन: नवजात शिशु का रूप धारण कर लेता हूं। तुम मुझे इसी समय अपने मित्र नंद जी के घर वृंदावन में भेज आओ और उनके यहां जो कन्या जन्मी है, उसे लाकर कंस के हवाले कर दो। उसी समय वसुदेव नवजात शिशु रूप श्रीकृष्ण को सूप में रखकर कारागृह से निकल पड़े और अथाह यमुना को पार कर नंद जी के घर पहुंचे। वहां उन्होंने नवजात शिशु को यशोदा के साथ सुला दिया और कन्या को लेकर मथुरा आ गए। कथा समापन पर प्रसाद वितरण भी किया गया।
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