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Bilaspur News: श्रीमद्भागवत कथा में सुनाया द्वारका नगरी का वर्णन
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संवाद न्यूज एजेंसी
झंडूता (बिलासपुर)। झंडूता के श्री सर्वेश्वर महादेव मंदिर अनंदघाट में महंत रुक्मेश्वर गिरी महाराज की अध्यक्षता में चल रही श्रीमद्भागवत महापुराण कथा के छठवें दिन द्वारका नगरी के बसाव की कथा सुनाई गई।
कथावाचक पंडित संदीप शास्त्री ने भक्तजनों को कथा का रसपान करवाते हुए कहा कि भगवान पृथ्वी का भार हरण करने के लिए और अपने भक्तों पर विशेष अनुग्रह करने के लिए धरा धाम पर अवतरित होते हैं। गो माता की कुंदन पुकार सुनकर के भगवान श्री कृष्ण अब मथुरा में कंस द्वारा सताई गई प्रजा को सांत्वना देने के लिए कंस वध करके मथुरा का राज्य अपने नाना अग्रसेन को सौंपा और नगर वासियों को अभय प्रदान किया। स्वयं सांदीपनि महर्षि के आश्रम उज्जैन में भगवान ने अपने भाई बलराम के साथ और गुरुकुल के सभी मित्रों के साथ में विद्या ग्रहण की। उन्होंने उद्धव को वृंदावन में भेजा और उससे कहा कि उद्धव तुम जाओ और माता यशोदा, वृंदावन के ग्वाले और गोपियों को मेरा संदेश सुनाना और उन्हें समझाते हुए कहना कि भगवान सबके हैं केवल आपके नहीं हैं। इसलिए आप उनकी चिंता उनके प्रति ग्रह का भाव छोड़ दो और अपने ज्ञान का आश्रय लेकर स्वयं को संभालो। गोपियों को समझाने के लिए गए उद्धव गोपियों के ज्ञान की महिमा को जान गए और गोपियों के चरण कमल की भूल माथे पर लगा करके वापस आए। मथुरा में जाकर भगवान से उन्होंने कहा कि प्रभु आपने मेरे ज्ञान चक्षु खोल दिए। मैं गोपियों के दर्शन करके धन्य हो गया। गोपियां साक्षात प्रेम की मूर्ति हैं। इसके बाद भगवान ने द्वारका नगरी बसाई और भगवान द्वारकाधीश बन गए।
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झंडूता (बिलासपुर)। झंडूता के श्री सर्वेश्वर महादेव मंदिर अनंदघाट में महंत रुक्मेश्वर गिरी महाराज की अध्यक्षता में चल रही श्रीमद्भागवत महापुराण कथा के छठवें दिन द्वारका नगरी के बसाव की कथा सुनाई गई।
कथावाचक पंडित संदीप शास्त्री ने भक्तजनों को कथा का रसपान करवाते हुए कहा कि भगवान पृथ्वी का भार हरण करने के लिए और अपने भक्तों पर विशेष अनुग्रह करने के लिए धरा धाम पर अवतरित होते हैं। गो माता की कुंदन पुकार सुनकर के भगवान श्री कृष्ण अब मथुरा में कंस द्वारा सताई गई प्रजा को सांत्वना देने के लिए कंस वध करके मथुरा का राज्य अपने नाना अग्रसेन को सौंपा और नगर वासियों को अभय प्रदान किया। स्वयं सांदीपनि महर्षि के आश्रम उज्जैन में भगवान ने अपने भाई बलराम के साथ और गुरुकुल के सभी मित्रों के साथ में विद्या ग्रहण की। उन्होंने उद्धव को वृंदावन में भेजा और उससे कहा कि उद्धव तुम जाओ और माता यशोदा, वृंदावन के ग्वाले और गोपियों को मेरा संदेश सुनाना और उन्हें समझाते हुए कहना कि भगवान सबके हैं केवल आपके नहीं हैं। इसलिए आप उनकी चिंता उनके प्रति ग्रह का भाव छोड़ दो और अपने ज्ञान का आश्रय लेकर स्वयं को संभालो। गोपियों को समझाने के लिए गए उद्धव गोपियों के ज्ञान की महिमा को जान गए और गोपियों के चरण कमल की भूल माथे पर लगा करके वापस आए। मथुरा में जाकर भगवान से उन्होंने कहा कि प्रभु आपने मेरे ज्ञान चक्षु खोल दिए। मैं गोपियों के दर्शन करके धन्य हो गया। गोपियां साक्षात प्रेम की मूर्ति हैं। इसके बाद भगवान ने द्वारका नगरी बसाई और भगवान द्वारकाधीश बन गए।
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