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Bilaspur News: घरेलू हिंसा मामले में अपील खारिज, पत्नी-बेटी को भरण-पोषण के लिए मिलेंगे 12 हजार मासिक
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सेना में कार्यरत पति की अपील खारिज कर अदालत ने पुराने आदेश को रखा बरकरार
-2500 रुपये किराया भी देना होगा,एएसजे घुमारवीं ने एसीजेएम के आदेश में हस्तक्षेप से किया इनकार
-सोने के आभूषण समेत फ्रिज, एलईडी, अलमारी, बेड, सोफा और अन्य स्त्रीधन लौटाना होगा
संवाद न्यूज एजेंसी
बिलासपुर। घरेलू हिंसा के एक मामले में पति को अदालत से कोई राहत नहीं मिली है। अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश घुमारवीं की अदालत ने पति की अपील खारिज कर दी है। अदालत ने पत्नी और उसकी नाबालिग बेटी को 12 हजार रुपये मासिक भरण-पोषण देने का आदेश बरकरार रखा है। इसके साथ ही 2500 रुपये मासिक किराया और स्त्रीधन लौटाने का आदेश भी कायम रखा गया है।
यह आदेश एसीजेएम घुमारवीं की अदालत के 21 अप्रैल 2025 के फैसले को चुनौती देने वाली अपील पर आया है। अदालत ने माना कि पत्नी घरेलू हिंसा के आरोपों को संभावनाओं की प्रधानता के आधार पर साबित करने में सफल रही है। महिला की शादी अगस्त 2017 में हमीरपुर जिले के बिजहर क्षेत्र के एक व्यक्ति से हुई थी। शादी के बाद उनकी एक बेटी हुई। महिला ने आरोप लगाया था कि ससुराल पक्ष ने उसे मानसिक और शारीरिक रूप से प्रताड़ित किया। पति पर शराब पीकर दुर्व्यवहार करने और धमकाने के आरोप भी लगाए गए थे। एसीजेएम घुमारवीं ने 21 अप्रैल 2025 को पत्नी को 8000 रुपये और बेटी को 4000 रुपये प्रतिमाह भरण-पोषण देने का आदेश दिया था। कुल 12 हजार रुपये मासिक भरण-पोषण तय किया गया था। अदालत ने साझा घर में एक कमरा, रसोई, बाथरूम और शौचालय उपलब्ध कराने के निर्देश भी दिए थे। यदि तीन महीने में आवास उपलब्ध नहीं होता, तो 2500 रुपये प्रतिमाह कमरा किराया देने को कहा गया था। इसके अतिरिक्त, स्त्रीधन लौटाने और मुकदमे के खर्च के लिए 20 हजार रुपये देने का आदेश भी दिया गया था।
पति ने इस आदेश के खिलाफ अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश घुमारवीं की अदालत में अपील दायर की थी। उसने दलील दी कि पत्नी अपनी मर्जी से मायके में रह रही है। पति ने यह भी कहा कि वह सेना की ओर से पत्नी को पहले ही 5000 रुपये प्रतिमाह दे रहा है। उसने अपने माता-पिता की जिम्मेदारी और वेतन से होने वाली कटौतियों का हवाला दिया। पति ने तर्क दिया कि घरेलू हिंसा के आरोप साबित नहीं हुए हैं। अदालत ने पति की इन दलीलों को स्वीकार नहीं किया। अदालत ने स्पष्ट किया कि सीआरपीसी की धारा 125 और घरेलू हिंसा अधिनियम की धारा 12 के प्रावधान अलग-अलग हैं। कानून पत्नी को दोनों प्रावधानों के तहत राहत लेने से नहीं रोकता है। अदालत ने कहा कि घरेलू हिंसा अधिनियम में सबूत का स्तर संभावनाओं की प्रधानता पर आधारित होता है। महिला के बयान और साक्ष्यों के आधार पर घरेलू हिंसा के आरोप साबित हुए हैं। पति की मासिक आय करीब 55 हजार रुपये है, इसलिए 12 हजार रुपये मासिक भरण-पोषण उचित है। अदालत ने स्त्रीधन लौटाने के आदेश को भी बरकरार रखा। इसमें सोने के आभूषण, फ्रिज, एलईडी टीवी, अलमारी, बेड, सोफा, कुर्सियां और टेबल शामिल हैं।
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-2500 रुपये किराया भी देना होगा,एएसजे घुमारवीं ने एसीजेएम के आदेश में हस्तक्षेप से किया इनकार
-सोने के आभूषण समेत फ्रिज, एलईडी, अलमारी, बेड, सोफा और अन्य स्त्रीधन लौटाना होगा
संवाद न्यूज एजेंसी
बिलासपुर। घरेलू हिंसा के एक मामले में पति को अदालत से कोई राहत नहीं मिली है। अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश घुमारवीं की अदालत ने पति की अपील खारिज कर दी है। अदालत ने पत्नी और उसकी नाबालिग बेटी को 12 हजार रुपये मासिक भरण-पोषण देने का आदेश बरकरार रखा है। इसके साथ ही 2500 रुपये मासिक किराया और स्त्रीधन लौटाने का आदेश भी कायम रखा गया है।
यह आदेश एसीजेएम घुमारवीं की अदालत के 21 अप्रैल 2025 के फैसले को चुनौती देने वाली अपील पर आया है। अदालत ने माना कि पत्नी घरेलू हिंसा के आरोपों को संभावनाओं की प्रधानता के आधार पर साबित करने में सफल रही है। महिला की शादी अगस्त 2017 में हमीरपुर जिले के बिजहर क्षेत्र के एक व्यक्ति से हुई थी। शादी के बाद उनकी एक बेटी हुई। महिला ने आरोप लगाया था कि ससुराल पक्ष ने उसे मानसिक और शारीरिक रूप से प्रताड़ित किया। पति पर शराब पीकर दुर्व्यवहार करने और धमकाने के आरोप भी लगाए गए थे। एसीजेएम घुमारवीं ने 21 अप्रैल 2025 को पत्नी को 8000 रुपये और बेटी को 4000 रुपये प्रतिमाह भरण-पोषण देने का आदेश दिया था। कुल 12 हजार रुपये मासिक भरण-पोषण तय किया गया था। अदालत ने साझा घर में एक कमरा, रसोई, बाथरूम और शौचालय उपलब्ध कराने के निर्देश भी दिए थे। यदि तीन महीने में आवास उपलब्ध नहीं होता, तो 2500 रुपये प्रतिमाह कमरा किराया देने को कहा गया था। इसके अतिरिक्त, स्त्रीधन लौटाने और मुकदमे के खर्च के लिए 20 हजार रुपये देने का आदेश भी दिया गया था।
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पति ने इस आदेश के खिलाफ अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश घुमारवीं की अदालत में अपील दायर की थी। उसने दलील दी कि पत्नी अपनी मर्जी से मायके में रह रही है। पति ने यह भी कहा कि वह सेना की ओर से पत्नी को पहले ही 5000 रुपये प्रतिमाह दे रहा है। उसने अपने माता-पिता की जिम्मेदारी और वेतन से होने वाली कटौतियों का हवाला दिया। पति ने तर्क दिया कि घरेलू हिंसा के आरोप साबित नहीं हुए हैं। अदालत ने पति की इन दलीलों को स्वीकार नहीं किया। अदालत ने स्पष्ट किया कि सीआरपीसी की धारा 125 और घरेलू हिंसा अधिनियम की धारा 12 के प्रावधान अलग-अलग हैं। कानून पत्नी को दोनों प्रावधानों के तहत राहत लेने से नहीं रोकता है। अदालत ने कहा कि घरेलू हिंसा अधिनियम में सबूत का स्तर संभावनाओं की प्रधानता पर आधारित होता है। महिला के बयान और साक्ष्यों के आधार पर घरेलू हिंसा के आरोप साबित हुए हैं। पति की मासिक आय करीब 55 हजार रुपये है, इसलिए 12 हजार रुपये मासिक भरण-पोषण उचित है। अदालत ने स्त्रीधन लौटाने के आदेश को भी बरकरार रखा। इसमें सोने के आभूषण, फ्रिज, एलईडी टीवी, अलमारी, बेड, सोफा, कुर्सियां और टेबल शामिल हैं।
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