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Bilaspur News: बाबा ने शाहतलाई आने का वादा किया था माता रत्नों से
Sun, 15 Mar 2026 05:49 PM IST
शिमला ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, बिलासपुर
संवाद न्यूज एजेंसी, बिलासपुर
Updated Sun, 15 Mar 2026 05:49 PM IST
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प्रदेश के प्रसिद्ध मेले के दौरान देश विदेश से पहुंचते हैं लाखों श्रद्धालु
बाबा बालक नाथ ने 12 साल तक चराई माता रत्नों की गायें
रामनाथ शर्मा
शाहतलाई (बिलासपुर)। प्रदेश के प्रसिद्ध धार्मिक स्थल शाहतलाई में चैत्र मास मेले का शुभारंभ हो गया है। बाबा बालक नाथ की तपोस्थली माने जाने वाले इस स्थान पर इन दिनों श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ रही है। मान्यता है कि बाबा बालक नाथ ने यहां 12 वर्षों तक मां रत्नों की गायें चराईं और वट वृक्ष के नीचे बैठकर तपस्या की।
पौराणिक कथाओं के अनुसार बाबा बालक नाथ गुजरात के जूनागढ़ से भगवान शिव के दर्शन के लिए यहां आए थे। मां रत्नों की गायें चराने के बदले उन्हें रोटियां और छाछ मिलती थी। इसी दौरान वे भक्ति और साधना में लीन रहते थे। कथाओं के अनुसार एक दिन बाबा तपस्या में लीन थे और इसी दौरान मवेशियों ने किसानों की फसल नुकसान कर दी। इससे नाराज किसानों ने मां रत्नों से शिकायत की। किसानों की बातों में आकर मां रत्नों ने बाबा को उलाहना दे दिया और रोटियों व छाछ का ताना भी दिया। बाबा ने शांत भाव से वट वृक्ष के खोल में 12 वर्षों से एकत्रित रोटियां और पास में छाछ से भरा तालाब दिखाया। यह देखकर मां रत्नों को बाबा के दिव्य पुरुष होने का एहसास हुआ और उन्होंने उनसे क्षमा मांगी। इसके बाद बाबा बालक नाथ वहां से धौलगिरी पर्वत की ऊंची चोटी पर स्थित गुफा की ओर चले गए, जो आज दियोटसिद्ध के नाम से प्रसिद्ध है।
मान्यता है कि शाहतलाई छोड़ते समय बाबा बालक नाथ ने मां रत्नों से वादा किया था कि वे हर वर्ष चैत्र माह में यहां आएंगे। इसी वचन की स्मृति में शाहतलाई में हर साल चैत्र मास मेला लगता है। देश के विभिन्न राज्यों से लाखों श्रद्धालु बाबा के दरबार में माथा टेकने पहुंचते हैं और रोट चढ़ाकर अपनी मनोकामनाएं मांगते हैं। श्रद्धालुओं का विश्वास है कि बाबा बालक नाथ के दरबार में सच्चे मन से की गई प्रार्थना अवश्य पूरी होती है। इन दिनों शाहतलाई का पूरा क्षेत्र रोशनी से जगमगा रहा है और श्रद्धालुओं की चहल-पहल बनी हुई है। पहले जहां श्रद्धालु पूरे माह या एक सप्ताह तक यहां डेरा डालकर भजन-कीर्तन करते थे और मंदिरों की सुबह-शाम आरती में भाग लेते थे, वहीं अब अधिकांश श्रद्धालु दर्शन कर उसी दिन लौट जाते हैं। इसके बावजूद चैत्र मास मेला आज भी श्रद्धा और आस्था का बड़ा केंद्र बना हुआ है। संवाद
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बाबा बालक नाथ ने 12 साल तक चराई माता रत्नों की गायें
रामनाथ शर्मा
शाहतलाई (बिलासपुर)। प्रदेश के प्रसिद्ध धार्मिक स्थल शाहतलाई में चैत्र मास मेले का शुभारंभ हो गया है। बाबा बालक नाथ की तपोस्थली माने जाने वाले इस स्थान पर इन दिनों श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ रही है। मान्यता है कि बाबा बालक नाथ ने यहां 12 वर्षों तक मां रत्नों की गायें चराईं और वट वृक्ष के नीचे बैठकर तपस्या की।
पौराणिक कथाओं के अनुसार बाबा बालक नाथ गुजरात के जूनागढ़ से भगवान शिव के दर्शन के लिए यहां आए थे। मां रत्नों की गायें चराने के बदले उन्हें रोटियां और छाछ मिलती थी। इसी दौरान वे भक्ति और साधना में लीन रहते थे। कथाओं के अनुसार एक दिन बाबा तपस्या में लीन थे और इसी दौरान मवेशियों ने किसानों की फसल नुकसान कर दी। इससे नाराज किसानों ने मां रत्नों से शिकायत की। किसानों की बातों में आकर मां रत्नों ने बाबा को उलाहना दे दिया और रोटियों व छाछ का ताना भी दिया। बाबा ने शांत भाव से वट वृक्ष के खोल में 12 वर्षों से एकत्रित रोटियां और पास में छाछ से भरा तालाब दिखाया। यह देखकर मां रत्नों को बाबा के दिव्य पुरुष होने का एहसास हुआ और उन्होंने उनसे क्षमा मांगी। इसके बाद बाबा बालक नाथ वहां से धौलगिरी पर्वत की ऊंची चोटी पर स्थित गुफा की ओर चले गए, जो आज दियोटसिद्ध के नाम से प्रसिद्ध है।
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मान्यता है कि शाहतलाई छोड़ते समय बाबा बालक नाथ ने मां रत्नों से वादा किया था कि वे हर वर्ष चैत्र माह में यहां आएंगे। इसी वचन की स्मृति में शाहतलाई में हर साल चैत्र मास मेला लगता है। देश के विभिन्न राज्यों से लाखों श्रद्धालु बाबा के दरबार में माथा टेकने पहुंचते हैं और रोट चढ़ाकर अपनी मनोकामनाएं मांगते हैं। श्रद्धालुओं का विश्वास है कि बाबा बालक नाथ के दरबार में सच्चे मन से की गई प्रार्थना अवश्य पूरी होती है। इन दिनों शाहतलाई का पूरा क्षेत्र रोशनी से जगमगा रहा है और श्रद्धालुओं की चहल-पहल बनी हुई है। पहले जहां श्रद्धालु पूरे माह या एक सप्ताह तक यहां डेरा डालकर भजन-कीर्तन करते थे और मंदिरों की सुबह-शाम आरती में भाग लेते थे, वहीं अब अधिकांश श्रद्धालु दर्शन कर उसी दिन लौट जाते हैं। इसके बावजूद चैत्र मास मेला आज भी श्रद्धा और आस्था का बड़ा केंद्र बना हुआ है। संवाद
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