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हर साल घट रहा गोबिंद सागर झील में मत्स्य उत्पादन
Updated Sun, 19 Nov 2017 10:52 PM IST
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बिलासपुर। रिकॉर्ड मछली उत्पादन के दावों की पोल मत्स्य विभाग के ही रिकॉर्ड ने ही खोल दी है। मत्स्य उत्पादन के पिछले पांच सालों के चौंकाने वाले आंकड़े सामने आए हैं। आंकड़ों के अनुसार हर साल गोबिंद सागर झील में मछलियों का उत्पादन घटा है, जबकि हर साल झील में मछलियों का ज्यादा बीज डाला गया है। ऐेसे में मछलियों का उत्पादन कम होना झील के अस्तित्व पर भी सवाल उठा रहा है।
मछलियों के उत्पाद में कमी के लिए विभाग स्वयं भी काफी हद तक जिम्मेदार है। सैकड़ों मछुआरों के परिवारों पर भी आर्थिक संकट खड़ा हो गया है। जिला में करीब 6508 मछुआरे हैं। गौर करें तो साल 2012-13 में गोबिंद सागर में मछली उत्पादन 1212 टन हुआ था। 2013-14 में गोबिंद सागर में मछली उत्पादन 1492 टन था। जबकि वर्ष 2014-15 में उत्पादन घटकर 1061 टन पहुंच गया। साल 2015-16 में मछली उत्पादन घटकर 858 टन ही रह गया। जबकि सबसे ज्यादा खराब हालत तो 2016-17 की है, जिसमें मछली उत्पादन केवल 754 टन ही हुआ है। जो कि चिंता का विषय बना हुआ है। ऐसे में चार की फिगर में रहने वाला मछली उत्पादन का रिकॉर्ड अब तीन के फिगर में आ गया है।
विभाग हर साल मछली के उत्पादन के लिए लाखों रुपये खर्च कर रहा है। लेकिन फिर भी उत्पादन में गिरावट के कारण विभाग की कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठना शुरू हो गए हैं। हालांकि विभाग इसे तकनीकी कारण बताकर अपना पल्लू झाड़ रहा है। लेकिन विभाग जो तर्क दे रहा है वह समझ से परे है।
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उधर, मत्स्य विभाग के निदेशक सतपाल मेहता का कहना है कि मछली उत्पादन में कमी के कई कारण हैं। तकनीकी कारणों से उत्पादन कम ज्यादा होता रहता है। लेकिन, मत्स्य विभाग मछली उत्पादन को बढ़ाने के लिए लगातार प्रयास कर रहा है।
गोबिंद सागर झील में मछली के कम उत्पादन का एक कारण नियम अनुसार मछली बीज झील में न डालना भी है। जलाशय संग्रह विकास समिति के नियम अनुसार झील में 80-100 मिलीमीटर मछली बीज डाला जाता है। लेकिन जिला में सभी नियमों को ताक पर रखकर गोबिंद सागर में 25 से 30 मिमी का बीज डाला जा रहा है। जो साइज कम होने के कारण नदी में सरबाइब नहीं कर पाता। इस कारण भी लगातार मछली उत्पादन में कमी आई है।
कोलडैम के बनने से मछलियों के उत्पादन पर भारी असर पड़ा है। मछुआरों की मानेें तो कोलडैम के बनने से पानी छनकर गोबिंद सागर झील में पहुंच रहा है। इससे पानी के साथ मछलियों के खाने के लिए फीड नहीं आ रही है। इससे यहां मछलियां बढ़ नहीं पा रही हैं।
फोरलेन निर्माण के दौरान निकलने वाली मिट्टी को अवैध तरीके से गोबिंद सागर झील में डंप किया जा रहा है। इससे मछलियों की पैदावार पर असर पड़ रहा है। मिट्टी के होने से यहां मछलियां को खाने के लिए फीड नहीं मिल पा रही है। इसके अलावा शहर से निकलने वाला सीवरेज का गंदा पानी भी बिना ट्रीटमेंट सतलुज में जा रहा है, जिससे मछलियों के उत्पादन पर असर पड़ रहा है।
मछलियों के उत्पाद में कमी के लिए विभाग स्वयं भी काफी हद तक जिम्मेदार है। सैकड़ों मछुआरों के परिवारों पर भी आर्थिक संकट खड़ा हो गया है। जिला में करीब 6508 मछुआरे हैं। गौर करें तो साल 2012-13 में गोबिंद सागर में मछली उत्पादन 1212 टन हुआ था। 2013-14 में गोबिंद सागर में मछली उत्पादन 1492 टन था। जबकि वर्ष 2014-15 में उत्पादन घटकर 1061 टन पहुंच गया। साल 2015-16 में मछली उत्पादन घटकर 858 टन ही रह गया। जबकि सबसे ज्यादा खराब हालत तो 2016-17 की है, जिसमें मछली उत्पादन केवल 754 टन ही हुआ है। जो कि चिंता का विषय बना हुआ है। ऐसे में चार की फिगर में रहने वाला मछली उत्पादन का रिकॉर्ड अब तीन के फिगर में आ गया है।
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विभाग हर साल मछली के उत्पादन के लिए लाखों रुपये खर्च कर रहा है। लेकिन फिर भी उत्पादन में गिरावट के कारण विभाग की कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठना शुरू हो गए हैं। हालांकि विभाग इसे तकनीकी कारण बताकर अपना पल्लू झाड़ रहा है। लेकिन विभाग जो तर्क दे रहा है वह समझ से परे है।
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उधर, मत्स्य विभाग के निदेशक सतपाल मेहता का कहना है कि मछली उत्पादन में कमी के कई कारण हैं। तकनीकी कारणों से उत्पादन कम ज्यादा होता रहता है। लेकिन, मत्स्य विभाग मछली उत्पादन को बढ़ाने के लिए लगातार प्रयास कर रहा है।
गोबिंद सागर झील में मछली के कम उत्पादन का एक कारण नियम अनुसार मछली बीज झील में न डालना भी है। जलाशय संग्रह विकास समिति के नियम अनुसार झील में 80-100 मिलीमीटर मछली बीज डाला जाता है। लेकिन जिला में सभी नियमों को ताक पर रखकर गोबिंद सागर में 25 से 30 मिमी का बीज डाला जा रहा है। जो साइज कम होने के कारण नदी में सरबाइब नहीं कर पाता। इस कारण भी लगातार मछली उत्पादन में कमी आई है।
कोलडैम के बनने से मछलियों के उत्पादन पर भारी असर पड़ा है। मछुआरों की मानेें तो कोलडैम के बनने से पानी छनकर गोबिंद सागर झील में पहुंच रहा है। इससे पानी के साथ मछलियों के खाने के लिए फीड नहीं आ रही है। इससे यहां मछलियां बढ़ नहीं पा रही हैं।
फोरलेन निर्माण के दौरान निकलने वाली मिट्टी को अवैध तरीके से गोबिंद सागर झील में डंप किया जा रहा है। इससे मछलियों की पैदावार पर असर पड़ रहा है। मिट्टी के होने से यहां मछलियां को खाने के लिए फीड नहीं मिल पा रही है। इसके अलावा शहर से निकलने वाला सीवरेज का गंदा पानी भी बिना ट्रीटमेंट सतलुज में जा रहा है, जिससे मछलियों के उत्पादन पर असर पड़ रहा है।