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दूसरों को रोशन करने वाले आज खुद अंधेरे में
Updated Wed, 07 Mar 2018 09:24 PM IST
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दूसरों को रोशन करने वाले आज खुद अंधेरे में
विस्थापितों के लिए नहीं बनी कोई ठोस नीति
विस्थापितों के कई आशियाने उजड़ने की कगार पर
अमर उजाला ब्यूरो
बिलासपुर।
दूसरे राज्यों को रोशन करने वाले बिलासपुर के सैकड़ों लोग आज खुद अंधेरे में हैं। हालत ऐसी है कि सरकार विस्थापितों के लिए आज तक कोई ठोक नीति नहीं बना पाई है। इसका परिणाम यह है कि आज जहां सैकड़ों परिवार उजड़ने की कगार पर पहुंच चुके हैं, वहीं अन्य पर खतरा मंडराया हुआ है। भाखड़ा विस्थापितों के कई घरों को पर हाईकोर्ट के आदेश के कारण गाज गिरना तय है। जबकि, आने वाले समय में कई और इसकी चपेट में आ सकते हैं। लेकिन, दूसरों को रोशन करने वाले इन लोगों के लिए न उस समय के तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू कोई नीति बना पाए और न ही अब की सरकारें कुछ कर पा रही हैं।
जिला कांग्रेस महासचिव संदीप सांख्यान कहते हैं कि बांध बनते समय देश के पहले प्रधानमंत्री स्व. जवाहरलाल नेहरू ने 1955 में विस्थापित एवं प्रभावित लोगों की ओर से ज्ञापन मिलने के बाद खुले मंच से कहा था कि भारतवर्ष की सरकार बिलासपुर की जनता के साथ हमेशा कंधे से कंधा मिलाकर खड़ी रहेगी और भाखड़ा विस्थापित और प्रभावितों के हक और अधिकारों की रक्षा सदैव करती रहेगी। जुलाई 1961 तक बिलासपुर की सतलुज नदी ने गोबिंद सागर झील का रूप ले लिया। जुलाई 1961 तक बिलासपुर के सभी विस्थापितों और प्रभावितों ने अपने नए बने आधे-अधूरे घरों में शरण ले ली। जुलाई 1961 तक नए सिरे से प्लाट आवंटन किया गया, लेकिन वह आधे-अधूरे तरीके से। आज तक किसी भी सरकार ने इन विस्थापितों के अधिकारों की रक्षा नहीं की। सिर्फ एक बार जिले में कांग्रेस की सरकार ने वर्ष 1986 में मिनी सेटलमेंट जरूर करवाई थी। पुराने बिलासपुर की स्थिति के अनुसार बिलासपुर के हर परिवार के पास 1 बीघा से लेकर 50 बीघा तक जमीन थी और यह वादा भी किया गया था कि हर परिवार को उनकी पानी में डूबी हुई जमीन के बदले में चार गुना जमीन दी जाएगी। बिलासपुर नगर में एक व्यवसायिक या रेजिडेंशियल प्लॉट का आवंटन किया जाएगा।
कहा कि विस्थापितों और प्रभावितों को लेकर एक विशेष तरह का एक्ट बनाया जाना चाहिए। इस अधिनियम के तहत बिलासपुर वासियों ने जो कुर्बानी देश के लिए दी है, उसका फल बिलासपुर वासियों को मिलना चाहिए। हिमाचल सरकार 326000 एकड़ जमीन अनुदान स्वरूप प्रदेश में बने औद्योगिक क्षेत्र, विश्वविद्यालय और अन्य संस्थानों को अनुदान स्वरूप दे रखी है तो क्यों न जिला बिलासपुर के प्रभावित और विस्थापितों के अधिकारों की रक्षा करने हेतु उनकी जमीन को एक बार फिर से सेटलमेंट करवा कर के इन विस्थापितों और प्रभावितों के अधिकारों को सुरक्षित रखा जाए।
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विस्थापितों के लिए नहीं बनी कोई ठोस नीति
विस्थापितों के कई आशियाने उजड़ने की कगार पर
अमर उजाला ब्यूरो
बिलासपुर।
दूसरे राज्यों को रोशन करने वाले बिलासपुर के सैकड़ों लोग आज खुद अंधेरे में हैं। हालत ऐसी है कि सरकार विस्थापितों के लिए आज तक कोई ठोक नीति नहीं बना पाई है। इसका परिणाम यह है कि आज जहां सैकड़ों परिवार उजड़ने की कगार पर पहुंच चुके हैं, वहीं अन्य पर खतरा मंडराया हुआ है। भाखड़ा विस्थापितों के कई घरों को पर हाईकोर्ट के आदेश के कारण गाज गिरना तय है। जबकि, आने वाले समय में कई और इसकी चपेट में आ सकते हैं। लेकिन, दूसरों को रोशन करने वाले इन लोगों के लिए न उस समय के तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू कोई नीति बना पाए और न ही अब की सरकारें कुछ कर पा रही हैं।
जिला कांग्रेस महासचिव संदीप सांख्यान कहते हैं कि बांध बनते समय देश के पहले प्रधानमंत्री स्व. जवाहरलाल नेहरू ने 1955 में विस्थापित एवं प्रभावित लोगों की ओर से ज्ञापन मिलने के बाद खुले मंच से कहा था कि भारतवर्ष की सरकार बिलासपुर की जनता के साथ हमेशा कंधे से कंधा मिलाकर खड़ी रहेगी और भाखड़ा विस्थापित और प्रभावितों के हक और अधिकारों की रक्षा सदैव करती रहेगी। जुलाई 1961 तक बिलासपुर की सतलुज नदी ने गोबिंद सागर झील का रूप ले लिया। जुलाई 1961 तक बिलासपुर के सभी विस्थापितों और प्रभावितों ने अपने नए बने आधे-अधूरे घरों में शरण ले ली। जुलाई 1961 तक नए सिरे से प्लाट आवंटन किया गया, लेकिन वह आधे-अधूरे तरीके से। आज तक किसी भी सरकार ने इन विस्थापितों के अधिकारों की रक्षा नहीं की। सिर्फ एक बार जिले में कांग्रेस की सरकार ने वर्ष 1986 में मिनी सेटलमेंट जरूर करवाई थी। पुराने बिलासपुर की स्थिति के अनुसार बिलासपुर के हर परिवार के पास 1 बीघा से लेकर 50 बीघा तक जमीन थी और यह वादा भी किया गया था कि हर परिवार को उनकी पानी में डूबी हुई जमीन के बदले में चार गुना जमीन दी जाएगी। बिलासपुर नगर में एक व्यवसायिक या रेजिडेंशियल प्लॉट का आवंटन किया जाएगा।
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कहा कि विस्थापितों और प्रभावितों को लेकर एक विशेष तरह का एक्ट बनाया जाना चाहिए। इस अधिनियम के तहत बिलासपुर वासियों ने जो कुर्बानी देश के लिए दी है, उसका फल बिलासपुर वासियों को मिलना चाहिए। हिमाचल सरकार 326000 एकड़ जमीन अनुदान स्वरूप प्रदेश में बने औद्योगिक क्षेत्र, विश्वविद्यालय और अन्य संस्थानों को अनुदान स्वरूप दे रखी है तो क्यों न जिला बिलासपुर के प्रभावित और विस्थापितों के अधिकारों की रक्षा करने हेतु उनकी जमीन को एक बार फिर से सेटलमेंट करवा कर के इन विस्थापितों और प्रभावितों के अधिकारों को सुरक्षित रखा जाए।
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