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सतलुज नदी किनारे फेंका जा रहा शहर कर कूड़ा-कचरा
Updated Mon, 27 Nov 2017 10:49 PM IST
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- फोटो : amarujala
बिलासपुर। बिलासपुर में नगर परिषद को एनजीटी के आदेशों की जरा भी परवाह नहीं है। एनजीटी की साफ मनाही के बाद भी शहर से निकलने वाला टनों कचरा बेरोकटोक सतलुज नदी किनारे फेंका जा रहा है। इससे आदेशों की अवहेलना की जा रही है। यहीं नहीं शहर से निकलने वाला सीवरेज का गंदा पानी भी बिना ट्रीटमेंट के नदी में जा रहा है। इससे सतलुज नदी प्रदूषित हो रही है। इसका असर भी दिखना शुरू हो गया है। साल दर साल मछलियों की पैदावार कम होती जा रही है। इससे सैकड़ों परिवारों पर भी आर्थिक संकट खड़ा हो गया है।
स्वच्छता के मामले में देश के टॉप 50 जिलों में बिलासपुर को 39 स्थान मिला है। लेकिन अभी भी धरातल पर कई कमियां बाकी हैं। जिला में भले ही हर घर में शौचालय निर्माण का दावा किया गया है। लेकिन हालत ऐसी है कि बिलासपुर शहर में सीवरेज की पूरी गंदगी गोबिंद सागर में जा रहा है। ठोस तरल कूड़ा प्रबंधन में भी भले ही जिला बेहतर पाया गया हो। लेकिन सच तो यह है कि आज भी शहर से निकलने वाला टनों के हिसाब से कूड़ा कचरा खैरियां में गोबिंद सागर के तट किनारे फेंका जा रहा है। जो सीधे गोबिंद सागर में पहुंच रहा है। ऐसे ही कई सवाल हैं जो स्वच्छता पर बड़े सवाल खड़े कर रहे हैं।
एनजीटी इस बारे में जिला प्रशासन व नगर परिषद को पहले ही आदेश दे चुकी है कि सतलुज नदी में किसी भी तरह का कचरा न फेंका जाए। शहर की गंदगी जो सीवरेज से निकलती है, उसमें बीबीएमबी की लापरवाही भी सामने आ रही है। यहां पर आईपीएच विभाग द्वारा दो सीवरेज ट्रीटमेंट प्लांट बनाए जाने हैं। लेकिन बीबीएमबी से एनओसी न मिल पाने के कारण कार्य आगे नहीं बढ़ पा रहा है। जबकि बजट विभाग के पास मौजूद है। ऐसे में सवाल यह है कि सतलुज नदी को गंदा क्यों किया जा रहा है। जबकि मछलियों की पैदावार साल दर साल कम होती जा रही है।
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इस बारे में एसडीएम सदर हरीश गज्जू का कहना है कि प्रशासन कचरा डंप करने के लिए नई जगह तलाश रहा है। जो पुरानी जगह है, वहां पर सतलुज नदी किनारे बाड़ लगा दिया गया है। ताकि कचरा नदी में न जा पाए। जैसे हीं नई जगह मिल जाएगी वहीं पर कचरे को डंप किया जाएगा।
जिले में कई सरकारी भवनों में भी शौचालय नहीं हैं। जिस कारण कर्मचारियों और अन्य लोगों को खुले में शौच जाना पड़ता है। बरठीं के पशु चिकित्सालय को बने 62 साल हो गए। लेकिन यहां आज तक शौचालय का निर्माण नहीं हो पाया। जबकि इस चिकित्सालय का निर्माण 1954 में हुआ है। ऐसी ही हालत कई अन्य स्थानों पर भी है।
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स्वच्छता के मामले में देश के टॉप 50 जिलों में बिलासपुर को 39 स्थान मिला है। लेकिन अभी भी धरातल पर कई कमियां बाकी हैं। जिला में भले ही हर घर में शौचालय निर्माण का दावा किया गया है। लेकिन हालत ऐसी है कि बिलासपुर शहर में सीवरेज की पूरी गंदगी गोबिंद सागर में जा रहा है। ठोस तरल कूड़ा प्रबंधन में भी भले ही जिला बेहतर पाया गया हो। लेकिन सच तो यह है कि आज भी शहर से निकलने वाला टनों के हिसाब से कूड़ा कचरा खैरियां में गोबिंद सागर के तट किनारे फेंका जा रहा है। जो सीधे गोबिंद सागर में पहुंच रहा है। ऐसे ही कई सवाल हैं जो स्वच्छता पर बड़े सवाल खड़े कर रहे हैं।
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एनजीटी इस बारे में जिला प्रशासन व नगर परिषद को पहले ही आदेश दे चुकी है कि सतलुज नदी में किसी भी तरह का कचरा न फेंका जाए। शहर की गंदगी जो सीवरेज से निकलती है, उसमें बीबीएमबी की लापरवाही भी सामने आ रही है। यहां पर आईपीएच विभाग द्वारा दो सीवरेज ट्रीटमेंट प्लांट बनाए जाने हैं। लेकिन बीबीएमबी से एनओसी न मिल पाने के कारण कार्य आगे नहीं बढ़ पा रहा है। जबकि बजट विभाग के पास मौजूद है। ऐसे में सवाल यह है कि सतलुज नदी को गंदा क्यों किया जा रहा है। जबकि मछलियों की पैदावार साल दर साल कम होती जा रही है।
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इस बारे में एसडीएम सदर हरीश गज्जू का कहना है कि प्रशासन कचरा डंप करने के लिए नई जगह तलाश रहा है। जो पुरानी जगह है, वहां पर सतलुज नदी किनारे बाड़ लगा दिया गया है। ताकि कचरा नदी में न जा पाए। जैसे हीं नई जगह मिल जाएगी वहीं पर कचरे को डंप किया जाएगा।
जिले में कई सरकारी भवनों में भी शौचालय नहीं हैं। जिस कारण कर्मचारियों और अन्य लोगों को खुले में शौच जाना पड़ता है। बरठीं के पशु चिकित्सालय को बने 62 साल हो गए। लेकिन यहां आज तक शौचालय का निर्माण नहीं हो पाया। जबकि इस चिकित्सालय का निर्माण 1954 में हुआ है। ऐसी ही हालत कई अन्य स्थानों पर भी है।