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एकलनारी की समस्याओं व मांगों को शामिल करने वाले दल को मिलेगा समर्थन: एकलनारी
Updated Sun, 29 Oct 2017 11:17 PM IST
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बिलासपुर। एकल नारी शक्ति संगठन का कहना है कि हिमाचल प्रदेश में विधवा, तलाकशुदा, पति लापता, एचआईवी पीड़िता, अविवाहिता, कैदी के रूप में सजा काट रहीं व दिव्यांगों के रूप में करीब 5 लाख एकल नारियां हैं। लेकिन, कोई भी राजनीतिक दल या नेता इन एकल नारियों की समस्याओं के निवारण के लिए गंभीर नहीं है। एकल नारी शक्ति संगठन की मांग है कि आगामी विधानसभा चुनावों के लिए अपने-अपने घोषणा पत्रों में राजनीतिक दल एकल नारियों की समस्याओं व मांगों को शामिल करें। अन्यथा चुनावों में मांगें शामिल न करने वाले राजनीतिक दल का बहिष्कार करेंगे।
जिला संयोजिका एवं राष्ट्रीय एकल नारी अधिकार मंच की सदस्या बृजबाला, बिमला देवी ने बिलासपुर में कहा कि संगठन की मांग है कि महिलाओं को सस्ता व सुलभ न्याय मिले, इसके लिए वैसी ही स्वायत्त न्याय पंचायतों का पुन: गठन किया जाए, जैसी वर्ष 1978 से पहले प्रदेश में कार्य करती थीं। स्वायत्त न्याय पंचायतों में महिलाओं को स्थानीय भाषा में अपनी बात कहना व समझना आसान होगा तथा उन्हें अपने गांव से दूर स्थित अदालतों में आने जाने की परेशानी से भी राहत मिलेगी वहीं खर्च भी नहीं होगा।
वहीं, नीति आयोग की सलाह के अनुसार राज्य सरकार कृषि कार्य में लगी महिलाओं का नाम राजस्व रिकॉर्ड में काश्तकार के रूप में दर्ज करें, क्योंकि कृषि का 80 प्रतिशत से अधिक का कार्य केवल महिलाएं ही करती हैं। इसके लिए विवाह के उपरांत महिलाओं के नाम को राजस्व दस्तावेजों में दर्ज किया जाना चाहिए। ऐसा करने पर पुरुष अपनी मनमर्जी से जमीन नहीं बेच सकेंगे व यह कार्य महिला हिंसा में भी काफी कमी लाएगा।
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काश्तकार के रूप में महिला का नाम दर्ज होना महिला सशक्तिकरण की दिशा में एक बेहतर प्रयास होगा। संगठन की यह भी मांग है कि राजस्थान, उत्तराखंड व झारखंड की तर्ज पर राज्य सरकारें परित्यक्त महिलाओं को परिभाषित करें। उनके लिए नीति बनाए व त्याग दी गई महिलाओं को अलग परिवार समझकर अलग राशन कार्ड भी बनाए।
उन्होंने बताया कि वर्तमान में हिमाचल प्रदेश में एकल नारी शक्ति संगठन की 15 हजार 258 एकल महिलाएं सदस्याएं हैं। राजनीतिक दलों को चाहिए कि एकल नारियों की समस्याओं पर ध्यान दें और उनकी मांगों को अपने चुनावी घोषणा पत्र में शामिल करें। इस अवसर पर अधिवक्ता प्रवेश चंदेल, रविंद्र मौजूद रहे।
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जिला संयोजिका एवं राष्ट्रीय एकल नारी अधिकार मंच की सदस्या बृजबाला, बिमला देवी ने बिलासपुर में कहा कि संगठन की मांग है कि महिलाओं को सस्ता व सुलभ न्याय मिले, इसके लिए वैसी ही स्वायत्त न्याय पंचायतों का पुन: गठन किया जाए, जैसी वर्ष 1978 से पहले प्रदेश में कार्य करती थीं। स्वायत्त न्याय पंचायतों में महिलाओं को स्थानीय भाषा में अपनी बात कहना व समझना आसान होगा तथा उन्हें अपने गांव से दूर स्थित अदालतों में आने जाने की परेशानी से भी राहत मिलेगी वहीं खर्च भी नहीं होगा।
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वहीं, नीति आयोग की सलाह के अनुसार राज्य सरकार कृषि कार्य में लगी महिलाओं का नाम राजस्व रिकॉर्ड में काश्तकार के रूप में दर्ज करें, क्योंकि कृषि का 80 प्रतिशत से अधिक का कार्य केवल महिलाएं ही करती हैं। इसके लिए विवाह के उपरांत महिलाओं के नाम को राजस्व दस्तावेजों में दर्ज किया जाना चाहिए। ऐसा करने पर पुरुष अपनी मनमर्जी से जमीन नहीं बेच सकेंगे व यह कार्य महिला हिंसा में भी काफी कमी लाएगा।
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काश्तकार के रूप में महिला का नाम दर्ज होना महिला सशक्तिकरण की दिशा में एक बेहतर प्रयास होगा। संगठन की यह भी मांग है कि राजस्थान, उत्तराखंड व झारखंड की तर्ज पर राज्य सरकारें परित्यक्त महिलाओं को परिभाषित करें। उनके लिए नीति बनाए व त्याग दी गई महिलाओं को अलग परिवार समझकर अलग राशन कार्ड भी बनाए।
उन्होंने बताया कि वर्तमान में हिमाचल प्रदेश में एकल नारी शक्ति संगठन की 15 हजार 258 एकल महिलाएं सदस्याएं हैं। राजनीतिक दलों को चाहिए कि एकल नारियों की समस्याओं पर ध्यान दें और उनकी मांगों को अपने चुनावी घोषणा पत्र में शामिल करें। इस अवसर पर अधिवक्ता प्रवेश चंदेल, रविंद्र मौजूद रहे।