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निहारखन गांव को जोड़ा जाए कोल डैम योजना से
Updated Fri, 13 Jul 2018 10:54 PM IST
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cold water
अमर उजाला ब्यूरो
जुखाला(बिलासपुर)। हमेशा से उपेक्षा का शिकार हो रहा निहारखन गांव एक बार फिर से उपेक्षा का शिकार हो गया है। परमार्थम हिमालयन सांस्कृतिक एवं सामाजिक विकास संस्था निहारखन बासला ने गांव के साथ हो रहे अन्याय को रोकने के लिए ब्रह्मपुखर में एक बैठक का आयोजन किया जिसकी अध्यक्षता संस्था के अध्यक्ष शैलेंद्र भड़ोल ने की।
कोल डैम से प्रदेश सरकार ने पूरे बिलासपुर जिला के लिए पेयजल योजना बनाई है, लेकिन इस योजना में बिलासपुर जिला के सबसे बड़े गांव निहारखन को नहीं लिया गया है। इस योजना में कोटला पंचायत को तो ले लिया गया है लेकिन इस पंचायत के अंतर्गत आने वाले जिला के सबसे बड़े गांव निहारखन को बाहर कर दिया गया है।
इससे पूर्व भी यह गांव हमेशा से उपेक्षा का शिकार होता आया है। पूर्व में जुखाला क्षेत्र के लिए बनी दावीं घाटी सिंचाई योजना में भी इस गांव को शामिल नहीं किया गया था जिसकी वजह से इस गांव में रहने वाले किसान आज भी मौसम के ऊपर निर्भर हैं। इस वजह से गांव के किसान कृषि को छोड़ रहे हैं जिस कारण कृषि योग्य जमीन भी बंजर बन चुकी है।
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इस अकेले गांव की आबादी लगभग 3000 है और गांव के अधिकतर लोगों का पेशा कृषि है। संस्था के लोगों ने प्रदेश सरकार, जिला प्रशासन और आईपीएच विभाग से मांग की है कि इस गांव को हिमाचल प्रदेश की सबसे बड़ी योजना कोल डैम के साथ जोड़ा जाए अन्यथा संस्था के लोग स्थानीय लोगों के साथ मिल कर आईपीएच अधिकारियों का घेराव करेंगे।
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जुखाला(बिलासपुर)। हमेशा से उपेक्षा का शिकार हो रहा निहारखन गांव एक बार फिर से उपेक्षा का शिकार हो गया है। परमार्थम हिमालयन सांस्कृतिक एवं सामाजिक विकास संस्था निहारखन बासला ने गांव के साथ हो रहे अन्याय को रोकने के लिए ब्रह्मपुखर में एक बैठक का आयोजन किया जिसकी अध्यक्षता संस्था के अध्यक्ष शैलेंद्र भड़ोल ने की।
कोल डैम से प्रदेश सरकार ने पूरे बिलासपुर जिला के लिए पेयजल योजना बनाई है, लेकिन इस योजना में बिलासपुर जिला के सबसे बड़े गांव निहारखन को नहीं लिया गया है। इस योजना में कोटला पंचायत को तो ले लिया गया है लेकिन इस पंचायत के अंतर्गत आने वाले जिला के सबसे बड़े गांव निहारखन को बाहर कर दिया गया है।
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इससे पूर्व भी यह गांव हमेशा से उपेक्षा का शिकार होता आया है। पूर्व में जुखाला क्षेत्र के लिए बनी दावीं घाटी सिंचाई योजना में भी इस गांव को शामिल नहीं किया गया था जिसकी वजह से इस गांव में रहने वाले किसान आज भी मौसम के ऊपर निर्भर हैं। इस वजह से गांव के किसान कृषि को छोड़ रहे हैं जिस कारण कृषि योग्य जमीन भी बंजर बन चुकी है।
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इस अकेले गांव की आबादी लगभग 3000 है और गांव के अधिकतर लोगों का पेशा कृषि है। संस्था के लोगों ने प्रदेश सरकार, जिला प्रशासन और आईपीएच विभाग से मांग की है कि इस गांव को हिमाचल प्रदेश की सबसे बड़ी योजना कोल डैम के साथ जोड़ा जाए अन्यथा संस्था के लोग स्थानीय लोगों के साथ मिल कर आईपीएच अधिकारियों का घेराव करेंगे।