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राम राज्य की स्थापना के लिए प्रभु राम को जानना होगा : साध्वी दिवेशा भारती
Tue, 07 Apr 2026 03:20 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, यमुना नगर
संवाद न्यूज एजेंसी, यमुना नगर
Updated Tue, 07 Apr 2026 03:20 AM IST
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रादौर में आयोजित श्रीराम कथा में आरती करती महिला श्रद्वालु। आयोजक
रादौर। दिव्य ज्योति जागृति संस्थान की ओर से शहर के शिव मंदिर अंधेरिया बाग धर्मशाला में चल रही श्री राम कथा का रविवार शाम को समापन हो गया। कथा के अंतिम दिन कथावाचक साध्वी दिवेशा भारती ने राम कथा का वर्णन किया।
उन्होंने बताया कि मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम के मार्गदर्शन में अयोध्या का राज्य सभी प्रकार से उन्नत था। क्या यही राम राज्य की वास्तविक परिभाषा है तो इसका जवाब है नहीं। यदि यही रामराज्य की सही परिभाषा है तो लंका भी तो भौतिक सम्पन्नता, समृद्धि, ऐश्वर्य, सुव्यवस्थित सेना में अग्रणी थी। परन्तु फिर भी उसे राम राज्य के समतुल्य नहीं कहा जाता, क्योंकि लंकावासी मानसिक स्तर पर पूर्णता अविकसित थे। उनके भीतर आसुरी प्रवृत्तियों का बोलवाला था। राम के राज्य की बात सुनते ही अक्सर मन में विचार आते हैं। कि राम राज्य आज भी होना चाहिये। कथावाचक साध्वी ने कहा कि वर्तमान समय में भी यदि हम ऐसे ही अलौकिक राम राज्य की स्थापना करना चाहतें हैं, तो सर्व प्रथम प्रभु राम को जानना होगा। प्रभु राम का प्राक्ट्य अपने भीतर करवाना होगा। जिसके लिए दिव्य नेत्रों की आवश्यकता है। लेकिन जब तक हमें एक पूर्ण सद्गुरु द्वारा ब्रह्मज्ञान की प्राप्ति नहीं होती, तब तक हम ईश्वर का साक्षात्कार नहीं कर सकते। सद्गुरु दीक्षा देते समय इस दिव्य नेत्र को खोल देते है। जिसके खुलते ही जिज्ञासु अपने भीतर ईश्वर के वास्तविक रूप का प्रत्यक्ष दर्शन करता है। जब भीतर हृदय के सिंहासन पर राम विराजमान होते है, तब राम राज्य की स्थापना होती है। कथा का समापन राम आरती के साथ किया गया। संवाद
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उन्होंने बताया कि मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम के मार्गदर्शन में अयोध्या का राज्य सभी प्रकार से उन्नत था। क्या यही राम राज्य की वास्तविक परिभाषा है तो इसका जवाब है नहीं। यदि यही रामराज्य की सही परिभाषा है तो लंका भी तो भौतिक सम्पन्नता, समृद्धि, ऐश्वर्य, सुव्यवस्थित सेना में अग्रणी थी। परन्तु फिर भी उसे राम राज्य के समतुल्य नहीं कहा जाता, क्योंकि लंकावासी मानसिक स्तर पर पूर्णता अविकसित थे। उनके भीतर आसुरी प्रवृत्तियों का बोलवाला था। राम के राज्य की बात सुनते ही अक्सर मन में विचार आते हैं। कि राम राज्य आज भी होना चाहिये। कथावाचक साध्वी ने कहा कि वर्तमान समय में भी यदि हम ऐसे ही अलौकिक राम राज्य की स्थापना करना चाहतें हैं, तो सर्व प्रथम प्रभु राम को जानना होगा। प्रभु राम का प्राक्ट्य अपने भीतर करवाना होगा। जिसके लिए दिव्य नेत्रों की आवश्यकता है। लेकिन जब तक हमें एक पूर्ण सद्गुरु द्वारा ब्रह्मज्ञान की प्राप्ति नहीं होती, तब तक हम ईश्वर का साक्षात्कार नहीं कर सकते। सद्गुरु दीक्षा देते समय इस दिव्य नेत्र को खोल देते है। जिसके खुलते ही जिज्ञासु अपने भीतर ईश्वर के वास्तविक रूप का प्रत्यक्ष दर्शन करता है। जब भीतर हृदय के सिंहासन पर राम विराजमान होते है, तब राम राज्य की स्थापना होती है। कथा का समापन राम आरती के साथ किया गया। संवाद
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