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परमात्मा का विधान अत्यंत सुव्यवस्थित : सिद्धेश्वरी
Mon, 16 Feb 2026 01:02 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, यमुना नगर
संवाद न्यूज एजेंसी, यमुना नगर
Updated Mon, 16 Feb 2026 01:02 AM IST
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दिव्य ज्योति जागृति संस्थान आश्रम में हनुमान गेट में उपस्थित संगत। आयोजक
संवाद न्यूज एजेंसी
जगाधरी। हनुमान गेट स्थित दिव्य ज्योति जागृति संस्थान आश्रम में साप्ताहिक सत्संग में साध्वी सिद्धेश्वरी भारती ने संगत को आध्यात्मिक प्रवचन से लाभान्वित करते हुए प्रकृति, परमात्मा और कर्म के गूढ़ सिद्धांतों पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि परमात्मा का विधान अत्यंत सुव्यवस्थित है।
साध्वी ने कहा कि परमात्मा ने प्रकृति को आधार बनाकर संपूर्ण सृष्टि का विस्तार किया और जड़-चेतन हर चराचर में स्वयं व्याप्त हो गए, लेकिन इस दिव्य रहस्य का बोध सभी जीवों को नहीं होता। साध्वी ने उदाहरण देते हुए कहा कि जैसे कोई जादूगर मंच पर खेल दिखाता है और दर्शकों को उसका रहस्य नहीं समझ आता, वैसे ही ब्रह्मज्ञानी संत इस सृष्टि के रहस्य को जानते हैं, परंतु वे इसे तब तक प्रकट नहीं करते जब तक साधक स्वयं माया से बाहर निकलने की इच्छा न रखे।
उन्होंने कहा कि जीवन की अधिकांश समस्याएं हमारे अपने कर्मों का परिणाम होती हैं। यही कर्म संचित और प्रारब्ध बनकर सुख-दुख के रूप में सामने आते हैं। ऐसे समय में व्यक्ति की विचारधारा, मनःस्थिति और प्रतिक्रिया महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है, क्योंकि परिस्थितियों पर हमारी प्रतिक्रिया ही भविष्य के प्रारब्ध को तय करती है। उन्होंने सुमिरन, सेवा, साधना और सत्संग के महत्व को रेखांकित करते हुए कहा कि संत महापुरुष ब्रह्मज्ञान के माध्यम से मनुष्य को वास्तविकता का बोध कराते हैं, जिससे जीवन के प्रति दृष्टिकोण सकारात्मक बनता है। निरंतर साधना से मनुष्य के भीतर कृतज्ञता का भाव जागृत होता है और वह अनुभव करता है कि ईश्वर जो करता है, वह अच्छे के लिए ही करता है।
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जगाधरी। हनुमान गेट स्थित दिव्य ज्योति जागृति संस्थान आश्रम में साप्ताहिक सत्संग में साध्वी सिद्धेश्वरी भारती ने संगत को आध्यात्मिक प्रवचन से लाभान्वित करते हुए प्रकृति, परमात्मा और कर्म के गूढ़ सिद्धांतों पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि परमात्मा का विधान अत्यंत सुव्यवस्थित है।
साध्वी ने कहा कि परमात्मा ने प्रकृति को आधार बनाकर संपूर्ण सृष्टि का विस्तार किया और जड़-चेतन हर चराचर में स्वयं व्याप्त हो गए, लेकिन इस दिव्य रहस्य का बोध सभी जीवों को नहीं होता। साध्वी ने उदाहरण देते हुए कहा कि जैसे कोई जादूगर मंच पर खेल दिखाता है और दर्शकों को उसका रहस्य नहीं समझ आता, वैसे ही ब्रह्मज्ञानी संत इस सृष्टि के रहस्य को जानते हैं, परंतु वे इसे तब तक प्रकट नहीं करते जब तक साधक स्वयं माया से बाहर निकलने की इच्छा न रखे।
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उन्होंने कहा कि जीवन की अधिकांश समस्याएं हमारे अपने कर्मों का परिणाम होती हैं। यही कर्म संचित और प्रारब्ध बनकर सुख-दुख के रूप में सामने आते हैं। ऐसे समय में व्यक्ति की विचारधारा, मनःस्थिति और प्रतिक्रिया महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है, क्योंकि परिस्थितियों पर हमारी प्रतिक्रिया ही भविष्य के प्रारब्ध को तय करती है। उन्होंने सुमिरन, सेवा, साधना और सत्संग के महत्व को रेखांकित करते हुए कहा कि संत महापुरुष ब्रह्मज्ञान के माध्यम से मनुष्य को वास्तविकता का बोध कराते हैं, जिससे जीवन के प्रति दृष्टिकोण सकारात्मक बनता है। निरंतर साधना से मनुष्य के भीतर कृतज्ञता का भाव जागृत होता है और वह अनुभव करता है कि ईश्वर जो करता है, वह अच्छे के लिए ही करता है।
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