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Yamuna Nagar News: कथा में श्रीकृष्ण-सुदामा का मित्रता प्रसंग सुनकर भाव-विभोर हुए श्रद्धालु
Sun, 24 May 2026 03:54 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, यमुना नगर
संवाद न्यूज एजेंसी, यमुना नगर
Updated Sun, 24 May 2026 03:54 AM IST
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रादौर। खेड़ा मोहल्ला स्थित प्राचीन नगरखेड़ा परिसर में आयोजित आठ दिवसीय श्रीमद्भागवत कथा के सातवें दिन साध्वी आत्मानंद पुरी ने श्रीकृष्ण-सुदामा मित्रता का प्रसंग सुनाया। भक्त-भगवान की मित्रता का प्रसंग सुनकर श्रद्धालु भाव-विभोर हो गए। कथा का समापन रविवार को होगा।
साध्वी आत्मानंद पुरी ने कहा कि श्रीकृष्ण और सुदामा की मित्रता सच्चे प्रेम, समर्पण और निस्वार्थ भाव का प्रतीक है। उन्होंने बताया कि दोनों संदीपनि ऋषि के आश्रम में साथ शिक्षा ग्रहण करते थे। एक बार गुरुमाता ने उन्हें जंगल से लकड़ियां लाने भेजा, जहां तेज बारिश के कारण दोनों को रात जंगल में ही बितानी पड़ी। गुरुमाता के दिए गए चनों को सुदामा ने कृष्ण के सोने का भ्रम कर अकेले खा लिया, लेकिन भगवान कृष्ण सब जानते हुए भी मौन रहे। साध्वी ने बताया कि समय बीतने पर श्रीकृष्ण द्वारकाधीश बन गए, जबकि सुदामा अत्यंत गरीब ब्राह्मण के रूप में जीवन व्यतीत करने लगे। परिवार की आर्थिक स्थिति खराब होने पर पत्नी के आग्रह पर सुदामा अपने मित्र कृष्ण से मिलने द्वारका पहुंचे। पत्नी ने पड़ोस से चावल मांगकर एक पोटली तैयार कर उन्हें दी। द्वारका पहुंचने पर श्रीकृष्ण ने सुदामा का अत्यंत प्रेम से स्वागत किया। उन्होंने नंगे पैर दौड़कर अपने मित्र को गले लगाया और सिंहासन पर बैठाकर उनके चरण धोए। कृष्ण ने सुदामा की लाई चावल की पोटली बड़े प्रेम से ग्रहण की।
आत्मानंद पुरी ने कहा कि सुदामा ने कृष्ण से कभी कुछ नहीं मांगा, लेकिन भगवान ने बिना कहे ही उनकी दरिद्रता दूर कर दी। जब सुदामा अपने गांव लौटे तो उनकी झोपड़ी की जगह महल था। आयोजक सदस्यों ने बताया कि कथा समापन पर रविवार को हवन करवाया जाएगा। इसके बाद भंडारा होगा। कथा के दौरान सहारनपुर से पंडित प्रिंस भारद्वाज और महंत मनीष पुरी भी मौजूद रहे। संवाद
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साध्वी आत्मानंद पुरी ने कहा कि श्रीकृष्ण और सुदामा की मित्रता सच्चे प्रेम, समर्पण और निस्वार्थ भाव का प्रतीक है। उन्होंने बताया कि दोनों संदीपनि ऋषि के आश्रम में साथ शिक्षा ग्रहण करते थे। एक बार गुरुमाता ने उन्हें जंगल से लकड़ियां लाने भेजा, जहां तेज बारिश के कारण दोनों को रात जंगल में ही बितानी पड़ी। गुरुमाता के दिए गए चनों को सुदामा ने कृष्ण के सोने का भ्रम कर अकेले खा लिया, लेकिन भगवान कृष्ण सब जानते हुए भी मौन रहे। साध्वी ने बताया कि समय बीतने पर श्रीकृष्ण द्वारकाधीश बन गए, जबकि सुदामा अत्यंत गरीब ब्राह्मण के रूप में जीवन व्यतीत करने लगे। परिवार की आर्थिक स्थिति खराब होने पर पत्नी के आग्रह पर सुदामा अपने मित्र कृष्ण से मिलने द्वारका पहुंचे। पत्नी ने पड़ोस से चावल मांगकर एक पोटली तैयार कर उन्हें दी। द्वारका पहुंचने पर श्रीकृष्ण ने सुदामा का अत्यंत प्रेम से स्वागत किया। उन्होंने नंगे पैर दौड़कर अपने मित्र को गले लगाया और सिंहासन पर बैठाकर उनके चरण धोए। कृष्ण ने सुदामा की लाई चावल की पोटली बड़े प्रेम से ग्रहण की।
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आत्मानंद पुरी ने कहा कि सुदामा ने कृष्ण से कभी कुछ नहीं मांगा, लेकिन भगवान ने बिना कहे ही उनकी दरिद्रता दूर कर दी। जब सुदामा अपने गांव लौटे तो उनकी झोपड़ी की जगह महल था। आयोजक सदस्यों ने बताया कि कथा समापन पर रविवार को हवन करवाया जाएगा। इसके बाद भंडारा होगा। कथा के दौरान सहारनपुर से पंडित प्रिंस भारद्वाज और महंत मनीष पुरी भी मौजूद रहे। संवाद
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