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Yamuna Nagar News: श्री आदि बद्री नारायण का शंख दिलाता है महाभारत की याद

Amar Ujala Bureau अमर उजाला ब्यूरो
Updated Mon, 22 May 2023 01:12 AM IST
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Shri Adi Badri Narayan's conch shell reminds of Mahabharata
शिवालिक की पहाड़ियों में आदिब्रदी ऐतिहासिक मंदिरों में ऐसे है। यहां शंख विराजमान जो महाभारत के युद्ध की याद ताजा कराता है।जो यहां आने वाले लाखों श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र बना है। जिसे भगवान श्री कृष्ण ने महाभारत के युद्ध में बजाकर महाभारत के युद्ध का आरंभ किया था। शंख के बजाने से मानव को संक्रामक रोगों से मुक्ति मिलती है। वातावरण से नकारात्मक ऊर्जा खत्म होती है, जिस स्थल पर शंख विराजमान है उसके पास कई किलोमीटर तक पर्यावरण व प्रकृति शुद्ध रहती है। मंदिर के महंत अनुसार पांच हजार एक सौ उन्नीस वर्ष पुराना पांचजन्य शंख है। महाभारत के युद्ध समापन के बाद जब पांडव उतर दिशा की ओर निकले तो सिंधुवन में भगवान नारायण की तपोस्थली पर पांचजन्य शंख को रखा गया। बता दें ये मंदिर जिले से लगभग 40 किलोमीटर दूर उत्तर दिशा में आदिबद्री मंदिर स्थित है।
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आदि बद्री मंदिर के महंत पंडित विनय चौबे ने बताया कि मान्यता है कि पांडवों ने अपने अज्ञातवास का समय भी यही बिताया था। महाभारत के आरंभ में भगवान श्री कृष्ण द्वारा बजाया गया पांचजन्य शंख आज भी यहां आदि ब्रदी मंदिर में मौजूद है। पांचजन्य शंख को विशेष धार्मिक उत्सवों पर पर्वों पर ही बजाया जाता है। हरि प्रबोधिनी एकादशी के दिन भी शंख को आरती के समय सुबह शाम बजाया जाता है। इस दिन भगवान विष्णु पाताल लोक से धरा लोक पर अवरित होते हैं। ऐसी मान्यता है कि यह मंदिर उत्तराखंड में बने बद्रीनाथ व केदारनाथ के मंदिर से भी प्राचीन है। महंत ने बताया पांडवों ने अपना अज्ञात काल भी आखिरी वर्ष यही बिताया था। एक बार नारायण लक्ष्मी से रुष्ट होकर सिंधुवन में आकर तपस्या में विराजमान हो जाते हैं। आकाश लोक में खोज करने पर जब नारायण को कुछ पता नही चलता तो माता लक्ष्मी नारद जी का स्मरण करती है। और नारद जी लक्ष्मी जी को कहते है की जब में मृत्यु लोक से विचरण करते हुए निकल रहा था तो मैने शिवालिक की तलहटी में बहने वाली सरस्वती नदी के पश्चिमी तट पर समप्रास नामक गुफा में देखा तो आदि बद्री नारायण तपस्या में लीन है। उसकी पूजा व्यास जी कर रहे है माता लक्ष्मी ने नारायण जी को तपस्या करते हुए देखा तो नारायण जी का रंग काला पड़ गया है तो लक्ष्मी माता ने बदली बन कर छाया की तभी से इसका नाम आदि बद्री नारायण पड़ गया। कार्तिक पूजन को श्री आदि बद्री नारायण मंदिर में पूजन का अधिक महत्व बड़ जाता है।
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