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Yamuna Nagar News: फर्जी दस्तावेज मामले में संत जगमोहन सिंह की सजा बरकरार
Thu, 12 Mar 2026 02:51 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, यमुना नगर
संवाद न्यूज एजेंसी, यमुना नगर
Updated Thu, 12 Mar 2026 02:51 AM IST
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संत जगमोहन सिंह
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यमुनानगर। फर्जी दस्तावेजों के इस्तेमाल से जुड़े मामले में दोषी करार दिए गए संतपुरा गुरुद्वारे के संत जगमोहन सिंह की सजा को लेकर अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश यशविंदर पाल सिंह की अदालत ने बुधवार को महत्वपूर्ण फैसला सुनाया। अदालत ने दोषी की अपील को आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए ट्रायल कोर्ट द्वारा सुनाई गई तीन साल की सजा को घटाकर दो साल कर दिया, जबकि जुर्माने की राशि यथावत रखी गई है। वहीं संत के साथी मनोहर सिंह को भी सजा हुई है।
मामले के अनुसार, मॉडल टाउन स्थित डेरा संतपुरा निश्चल सिंह गुरुद्वारा साहिब के सेवादार संत जगमोहन सिंह, जो संत त्रिलोचन सिंह के चेले बताए गए हैं, के खिलाफ फर्जी दस्तावेजों के इस्तेमाल से संबंधित मामला दर्ज हुआ था। इस मामले की सुनवाई के बाद 12 नवंबर 2018 तथा 22 नवंबर 2018 को न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी अजय कुमार की अदालत ने आरोपी को भारतीय दंड संहिता की धारा 471 और 120-बी के तहत दोषी ठहराते हुए तीन वर्ष के कठोर कारावास की सजा सुनाई थी। साथ ही 10 हजार रुपये का जुर्माना भी लगाया गया था।
ट्रायल कोर्ट के फैसले के खिलाफ दोषी ने अतिरिक्त सत्र न्यायालय में अपील दायर की थी। मामले की सुनवाई के बाद अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश यशविंदर पाल सिंह ने 11 मार्च 2026 को अपना निर्णय सुनाया। अदालत ने अपील को आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए सजा में संशोधन किया और तीन साल की कैद को घटाकर दो साल कर दिया। हालांकि अदालत ने जुर्माने की राशि में कोई बदलाव नहीं किया। अदालत के आदेश के अनुसार, यदि दोषी जुर्माना अदा नहीं करता तो उसे तीन महीने की अतिरिक्त साधारण कैद भुगतनी होगी। हालांकि रिकॉर्ड के अनुसार दोषी द्वारा जुर्माना पहले ही ट्रायल कोर्ट में जमा कराया जा चुका है।
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अदालत ने अपने आदेश में यह भी स्पष्ट किया कि जांच और ट्रायल के दौरान आरोपी द्वारा जेल में बिताई गई अवधि को दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 428 के तहत सजा में समायोजित किया जाएगा। इसके साथ ही अदालत ने जिला जेल यमुनानगर, जगाधरी के अधीक्षक को वारंट जारी कर दोषी संत जगमोहन सिंह को हिरासत में लेकर शेष सजा काटने के लिए जेल भेजने के निर्देश दिए हैं।
फर्जी वसीयत का है मामला
जानकारी अनुसार संत जगमोहन सिंह ने डेरे में रहने वाले संत उजागर सिंह के नाम से फर्जी वसीयत तैयार करवाई थी। आरोप है कि वसीयत में उजागर सिंह की जगह स्वयं हस्ताक्षर किए गए और गवाह के रूप में मनोहर सिंह के हस्ताक्षर करवाए गए। बाद में इस वसीयत को जिला अदालत में दाखिल कर पैसे निकलवाने का प्रयास किया गया। इस वसीयत को चुनौती देते हुए कोर्ट में याचिका दायर की गई, जिस पर सुनवाई के बाद अदालत ने उन्हें दोषी करार दिया था।
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मामले के अनुसार, मॉडल टाउन स्थित डेरा संतपुरा निश्चल सिंह गुरुद्वारा साहिब के सेवादार संत जगमोहन सिंह, जो संत त्रिलोचन सिंह के चेले बताए गए हैं, के खिलाफ फर्जी दस्तावेजों के इस्तेमाल से संबंधित मामला दर्ज हुआ था। इस मामले की सुनवाई के बाद 12 नवंबर 2018 तथा 22 नवंबर 2018 को न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी अजय कुमार की अदालत ने आरोपी को भारतीय दंड संहिता की धारा 471 और 120-बी के तहत दोषी ठहराते हुए तीन वर्ष के कठोर कारावास की सजा सुनाई थी। साथ ही 10 हजार रुपये का जुर्माना भी लगाया गया था।
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ट्रायल कोर्ट के फैसले के खिलाफ दोषी ने अतिरिक्त सत्र न्यायालय में अपील दायर की थी। मामले की सुनवाई के बाद अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश यशविंदर पाल सिंह ने 11 मार्च 2026 को अपना निर्णय सुनाया। अदालत ने अपील को आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए सजा में संशोधन किया और तीन साल की कैद को घटाकर दो साल कर दिया। हालांकि अदालत ने जुर्माने की राशि में कोई बदलाव नहीं किया। अदालत के आदेश के अनुसार, यदि दोषी जुर्माना अदा नहीं करता तो उसे तीन महीने की अतिरिक्त साधारण कैद भुगतनी होगी। हालांकि रिकॉर्ड के अनुसार दोषी द्वारा जुर्माना पहले ही ट्रायल कोर्ट में जमा कराया जा चुका है।
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अदालत ने अपने आदेश में यह भी स्पष्ट किया कि जांच और ट्रायल के दौरान आरोपी द्वारा जेल में बिताई गई अवधि को दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 428 के तहत सजा में समायोजित किया जाएगा। इसके साथ ही अदालत ने जिला जेल यमुनानगर, जगाधरी के अधीक्षक को वारंट जारी कर दोषी संत जगमोहन सिंह को हिरासत में लेकर शेष सजा काटने के लिए जेल भेजने के निर्देश दिए हैं।
फर्जी वसीयत का है मामला
जानकारी अनुसार संत जगमोहन सिंह ने डेरे में रहने वाले संत उजागर सिंह के नाम से फर्जी वसीयत तैयार करवाई थी। आरोप है कि वसीयत में उजागर सिंह की जगह स्वयं हस्ताक्षर किए गए और गवाह के रूप में मनोहर सिंह के हस्ताक्षर करवाए गए। बाद में इस वसीयत को जिला अदालत में दाखिल कर पैसे निकलवाने का प्रयास किया गया। इस वसीयत को चुनौती देते हुए कोर्ट में याचिका दायर की गई, जिस पर सुनवाई के बाद अदालत ने उन्हें दोषी करार दिया था।