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क्रांतिकारी शहीद राजगुरु का जन्मदिन मनाया
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क्रांतिकारी राजगुरू की प्रतिमा पर पुष्प अर्पित कर नमन करते ग्रामीण। संवाद
- फोटो : Yamuna Nagar
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संवाद न्यूज एजेंसी
जठलाना। इंकलाब मंदिर में मंगलवार को क्रांतिकारी शहीद राजगुरु का जन्मदिन मनाया गया। लोगों ने उनकी प्रतिमा पर पुष्प अर्पित कर उन्हें नमन किया। इस दौरान लोगों को शहीद के जीवन के बारे में जानकारी दी गई।
इंकलाब मंदिर के संस्थापक एडवोकेट वरयाम सिंह ने बताया क्रांतिकारी राजगुरु का जन्म 24 अगस्त 1908 को पुणे जिले के खेड़ा गांव में
में हुआ था। वाराणसी में पढ़ाई के दौरान इनका संपर्क चंद्रशेखर आजाद से हुआ। वे आजाद से मिलकर इतने प्रभावित हुए कि इनको अपने दल में मिला लिया और खुद निशानेबाजी सिखाई। जब दिल्ली की असेंबली में बम फेंकने का निश्चय हुआ तो राजगुरु ने चंद्रशेखर आजाद से आग्रह किया कि भगत सिंह के साथ उन्हें भेजा जाए, पर उन्हें इसकी अनुमति नहीं मिली। इससे वे वापस पुणे आ गए। पुणे में उन्होंने कई लोगों से अंग्रेज अधिकारी के वध की चर्चा कर दी। उनके पास कुछ शस्त्र भी थे।
क्रांति समर्थक एक संपादक की शव यात्रा में उन्होंने उत्साह में आकर कुछ नारे भी लगा दिए। इससे वे गुप्तचरों की निगाह में आ गए। पुणे में उन्होंने एक अंग्रेज अधिकारी को मारने का प्रयास किया, लेकिन सफलता नहीं मिली। इसके अगले ही दिन उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया तथा एक अंग्रेज अधिकारी के वध का मुकदमा चलाकर मृत्यु दंड घोषित किया गया। 23 मार्च, 1931 को भगत सिंह और सुखदेव के साथ वे भी फांसी पर चढ़ गए।
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रादौर संवाद के अनुसार हाफिजपुर स्थित एमडीवीएम पब्लिक स्कूल में भी क्रांतिकारी राजगुरु का जन्म दिवस मनाया गया। प्रिंसिपल अंजू गुलाटी ने बच्चों को बताया कि अमर शहीद का राजगुरु के बारे में जानकारी दी। उन्होंने बताया कि 1919 में जलियांवाला बाग में जनरल डायर के नेतृत्व में किए गए नरसंहार ने राजगुरु को ब्रिटिश साम्राज्य के खिलाफ बागी और निर्भीक बना दिया था।
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जठलाना। इंकलाब मंदिर में मंगलवार को क्रांतिकारी शहीद राजगुरु का जन्मदिन मनाया गया। लोगों ने उनकी प्रतिमा पर पुष्प अर्पित कर उन्हें नमन किया। इस दौरान लोगों को शहीद के जीवन के बारे में जानकारी दी गई।
इंकलाब मंदिर के संस्थापक एडवोकेट वरयाम सिंह ने बताया क्रांतिकारी राजगुरु का जन्म 24 अगस्त 1908 को पुणे जिले के खेड़ा गांव में
में हुआ था। वाराणसी में पढ़ाई के दौरान इनका संपर्क चंद्रशेखर आजाद से हुआ। वे आजाद से मिलकर इतने प्रभावित हुए कि इनको अपने दल में मिला लिया और खुद निशानेबाजी सिखाई। जब दिल्ली की असेंबली में बम फेंकने का निश्चय हुआ तो राजगुरु ने चंद्रशेखर आजाद से आग्रह किया कि भगत सिंह के साथ उन्हें भेजा जाए, पर उन्हें इसकी अनुमति नहीं मिली। इससे वे वापस पुणे आ गए। पुणे में उन्होंने कई लोगों से अंग्रेज अधिकारी के वध की चर्चा कर दी। उनके पास कुछ शस्त्र भी थे।
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क्रांति समर्थक एक संपादक की शव यात्रा में उन्होंने उत्साह में आकर कुछ नारे भी लगा दिए। इससे वे गुप्तचरों की निगाह में आ गए। पुणे में उन्होंने एक अंग्रेज अधिकारी को मारने का प्रयास किया, लेकिन सफलता नहीं मिली। इसके अगले ही दिन उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया तथा एक अंग्रेज अधिकारी के वध का मुकदमा चलाकर मृत्यु दंड घोषित किया गया। 23 मार्च, 1931 को भगत सिंह और सुखदेव के साथ वे भी फांसी पर चढ़ गए।
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रादौर संवाद के अनुसार हाफिजपुर स्थित एमडीवीएम पब्लिक स्कूल में भी क्रांतिकारी राजगुरु का जन्म दिवस मनाया गया। प्रिंसिपल अंजू गुलाटी ने बच्चों को बताया कि अमर शहीद का राजगुरु के बारे में जानकारी दी। उन्होंने बताया कि 1919 में जलियांवाला बाग में जनरल डायर के नेतृत्व में किए गए नरसंहार ने राजगुरु को ब्रिटिश साम्राज्य के खिलाफ बागी और निर्भीक बना दिया था।