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Yamuna Nagar News: पातालेश्वर महादेव मंदिर में छिपे कई रहस्य

Mon, 22 Jul 2024 04:35 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, यमुना नगर
संवाद न्यूज एजेंसी, यमुना नगर Updated Mon, 22 Jul 2024 04:35 AM IST
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Many secrets hidden in Pataleshwar Mahadev Temple
अभय सिंह
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जगाधरी। मुख्यालय से करीब 10 किलोमीटर दूर बूड़िया के गांव दयालगढ़ में सैकड़ों वर्ष पुराना शिव मंदिर स्थित है। यह श्री ज्योर्तिलिंग सिद्ध पीठ पातालेश्वर महादेव मंदिर के नाम से प्रसिद्ध है। इस पौराणिक व ऐतिहासिक मंदिर की काफी मान्यता है। यह मंदिर स्वयं में कई रहस्य व कथाएं समेटे हुए हैं।
सिद्धपीठ पातालेश्वर महादेव मंदिर में देवों के देव महादेव शिवलिंग रूप में विराजमान हैं। स्वयं-भू शिवलिंग होने के कारण इसका नाम पातालेश्वर महादेव पड़ा है। इस मंदिर का इतिहास महाभारत काल के समय का बताया जाता है। हालांकि यहां शिवलिंग प्रकट होने के समय की किसी के पास कोई सटीक व पुख्ता जानकारी या अभिलेख नहीं है।
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वहीं मंदिर में एक प्राचीन एवं ऐतिहासिक शिव बावड़ी भी है। जो पाताल लोक से कहां तक है इसका खुलासा आज तक कोई नहीं कर पाया है। इस मंदिर को लेकर दयालगढ़, बूड़िया, जगाधरी सहित जिलावासियों की ही बल्कि दूसरे जिलों व राज्यों के लोगों में भी भारी आस्था है। यही कारण है कि शिवरात्रि व सावन के महीने में यहां बहुत ज्यादा भीड़ रहती है। फाल्गुन माह की महाशिरात्रि व श्रावण माह की शिवरात्रि पर स्वयं-भू शिवलिंग का अभिषेक करने के लिए भक्तों की लंबी कतार लगती है।
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मंदिर ट्रस्ट के अध्यक्ष डॉ. जनार्दन शर्मा ने बताया कि यहां विभिन्न राज्यों व विदेशों से श्रद्धालु भगवान शिव के दर्शन करने आते हैं। स्वयंभू शिवलिंग के रूप में विराजमान भगवान पातालेश्वर महादेव का जलाभिषेक कर मनोकामनाएं पूरी करते हैं। इस मंदिर में जिलावासियों की भारी आस्था है। मंदिर आने वाले ऐसे श्रद्धालु भी आते हैं, जिनकी कई पीढि़या मंदिर में पातालेश्वर महादेव की पूजा व दर्शन के लिए आती हैं। संवाद

पहले यहां से निकलता था दूध ः मुख्य पुजारी

मंदिर प्रांगण में एक शिव बावड़ी है। जहां भगवान शिव की विशाल प्रतिमा स्थापित है। वहीं बावड़ी में एक अत्यंत प्राचीन कुआं भी है। भले ही क्षेत्र में सूखा पड़ जाए, लेकिन यहां पानी कभी नहीं सूखता है। मंदिर के मुख्य पुजारी मुकेश गौतम ने बताया कि प्राचीन काल में जब क्षेत्र में अकाल पड़ जाता था तो लोग इसी बावड़ी से जल लाकर भगवान शिव का अभिषेक करते थे। ऐसा करते करते जब भगवान शंकर की जलहरी भर जाती थी तो बारिश होने लगती थी। इसके अलावा यहां स्थित प्राचीनतम पाताल कुआं भी रहस्य पूर्ण है। इसके बारे मान्यता है कि किसी समय इस कुएं से दूध निकलता था।



जगतगुरु शंकराचार्य ने मंदिर में किया था तप

डॉ. सुधीर शर्मा ने बताया कि 1985 में यहां जगन्नाथपुरी गोवर्धन पीठ से जगतगुरु शंकराचार्य स्वामी निरंजन देव तीर्थ पधारे थे। स्वामी महाराज ने यहां कुछ दिन तप किया था। इसके बाद उन्होंने मंदिर को एक सिद्ध पीठ बताया था। जगतगुरु ने इतिहास के कई सुनहरे पन्नों खंगालते हुए इस स्थान से जुड़े कई रहस्य उजागर किए थे।
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