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84 दिन के कठोर तप से हुई प्रभु को केवल ज्ञान की प्राप्ती- आनंद जैन
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पाठ में भाग लेते श्रद्धालु।
- फोटो : Yamuna Nagar
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यमुनानगर। श्री दिगंबर जैन चैताल्य भाई कन्हैया साहिब चौक के परिसर में एक भव्य कार्यक्रम का आयोजन किया गया। कार्यक्रम की अध्यक्षता मंदिर संचालक आनंद जैन ने की। जबकि संचालन राकेश जैन व चक्रेश जैन ने किया। कार्यक्रम के दौरान भगवान पार्श्वनाथ चालीसा व प्रभु चालीसा का पाठ किया गया।
इस दौरान प्रभु जी का अभिषेक, शांतिधारा, पूजा-प्रक्षाल व आरती की गई। इस अवसर पर आनंद जैन ने कहा कि भगवान पार्श्वनाथ जैन धर्म के 23 वें तीर्थंकर माने जाते हैं, जिन्होंने अज्ञान, अंधकार मध्य में क्रांति का बीज बन कर पृथ्वी पर जन्म लिया था। इनका जन्म पौष माह के कृष्ण पक्ष की दशमी तिथि को विशाखा नक्षत्र में वाराणसी नगर में हुआ था।
इनके शरीर का रंग नीला और चिह्न सर्प माना जाता है। भगवान पार्श्वनाथ को तीर्थंकर बनने के लिए पूरे नौ जन्म लेने पड़े। पूर्व जन्म के संचित पुण्यों और दसवें जन्म के तप के फल से ही वे 23 वें तीर्थंकर बने। उन्होंने बताया कि भगवान पार्श्वनाथ ने पौष माह के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि को वाराणसी नगरी में दीक्षा की प्राप्ति की थी और दीक्षा प्राप्ति के दो दिन बाद खीर से पहला पारणा किया।
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भगवान पार्श्वनाथ ने केवल 30 साल उम्र में ही सांसारिक मोह माया और गृह का त्याग कर संन्यास धारण कर लिया था। 84 दिन तक कठोर तप करने के बाद चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को वाराणसी में ही घातकी वृक्ष के नीचे इन्होंने कैवल्य ज्ञान को प्राप्त किया। भगवान पार्श्वनाथ का निर्वाण पारसनाथ पहाड़ पर हुआ था। चक्रेश जैन ने बताया कि भगवान चंद्र प्रभु के पूजन से सभी कार्य मंगल होते हैं और कष्टों का निवारण हो जाता है। इनकी मूर्ति शांत और आकर्षक है, जोकि दिगम्बर भेष में दिखाई देती है। भगवान चंद्र प्रभु को देवों को देव कहा जाता है और इनके पूजन से सभी भक्तों के दुखों का नाश होता है।
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इस दौरान प्रभु जी का अभिषेक, शांतिधारा, पूजा-प्रक्षाल व आरती की गई। इस अवसर पर आनंद जैन ने कहा कि भगवान पार्श्वनाथ जैन धर्म के 23 वें तीर्थंकर माने जाते हैं, जिन्होंने अज्ञान, अंधकार मध्य में क्रांति का बीज बन कर पृथ्वी पर जन्म लिया था। इनका जन्म पौष माह के कृष्ण पक्ष की दशमी तिथि को विशाखा नक्षत्र में वाराणसी नगर में हुआ था।
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इनके शरीर का रंग नीला और चिह्न सर्प माना जाता है। भगवान पार्श्वनाथ को तीर्थंकर बनने के लिए पूरे नौ जन्म लेने पड़े। पूर्व जन्म के संचित पुण्यों और दसवें जन्म के तप के फल से ही वे 23 वें तीर्थंकर बने। उन्होंने बताया कि भगवान पार्श्वनाथ ने पौष माह के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि को वाराणसी नगरी में दीक्षा की प्राप्ति की थी और दीक्षा प्राप्ति के दो दिन बाद खीर से पहला पारणा किया।
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भगवान पार्श्वनाथ ने केवल 30 साल उम्र में ही सांसारिक मोह माया और गृह का त्याग कर संन्यास धारण कर लिया था। 84 दिन तक कठोर तप करने के बाद चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को वाराणसी में ही घातकी वृक्ष के नीचे इन्होंने कैवल्य ज्ञान को प्राप्त किया। भगवान पार्श्वनाथ का निर्वाण पारसनाथ पहाड़ पर हुआ था। चक्रेश जैन ने बताया कि भगवान चंद्र प्रभु के पूजन से सभी कार्य मंगल होते हैं और कष्टों का निवारण हो जाता है। इनकी मूर्ति शांत और आकर्षक है, जोकि दिगम्बर भेष में दिखाई देती है। भगवान चंद्र प्रभु को देवों को देव कहा जाता है और इनके पूजन से सभी भक्तों के दुखों का नाश होता है।