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संयमी जीवन जीना भिक्षु का लक्षण : डॉ. स्वाति

Tue, 29 Oct 2024 12:57 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, यमुना नगर
संवाद न्यूज एजेंसी, यमुना नगर Updated Tue, 29 Oct 2024 12:57 AM IST
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Leading a disciplined life is the characteristic of a monk: Dr. Swati
संवाद न्यूज एजेंसी
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यमुनानगर। एसएस जैन सभा मॉडल टाउन के प्रांगण में चल रहे चतुर्मास के 100 वें दिन साध्वी डॉ. स्वाति महाराज ने भिक्षु के लक्षण पर विस्तार से चर्चा की। उन्होंने बताया कि भिक्षु का अर्थ जैसे तैसे सरस स्वादिष्ट आहार भिक्षा द्वारा लाने और पेट भर लेने वाला नहीं है। अपितु अपने मोक्ष प्राप्ति के लक्ष्य के प्रति जागरूक रहकर सुख सुविधा, पद-प्रतिष्ठा, प्रसिद्ध आदि के चक्कर में ना पड़कर, संयमी जीवन जीना ही भिक्षु का लक्षण है।
उन्होंने कहा कि भिक्षा प्राप्त करने का अधिकार उसी साधक को होता है जो अपने घर परिवार, धन संपत्ति, जमीन जायदाद तथा समस्त बहरिय परिग्रह को छोड़ कर सर्वदा एकाकी होकर जीवन चलाता है वही सच्चा भिक्षा जीवी है, किंतु अंगार बन जाने पर भी उसे अन्न, वस्त्र,पात्र, मकान तथा अन्य आवश्यक धर्म उपकरणों की आवश्यकता होती है। उसके लिए वह क्या करें और कैसे अपने संयम पथ पर निर्भर होकर चले? इसके लिए प्रस्तुत अध्ययन में उन सब बाधक तत्वों को दर्शाया है जो भिक्षा जीवी निर्ग्रंथ के मार्ग में पग पग पर आते हैं।
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डॉ. स्वाति ने कहा कि सर्वप्रथम वह भिक्षु जीवन में बाधक माया,निदान और सांसारिक भूतपूर्व संबंधियों से संबंध विच्छेद करता है।काम कामना का त्याग करता है तथा परिचितों या अति भक्तिशील गृहस्थों के यहां प्रायू आहार पानी न लेकर अज्ञात परिचित घरों से ही आहार पानी का ग्रहण करता है।वह रात्रि भोजन या रात्रि भिक्षा नहीं करता ना ही मनोज्ञ सचित्त या आचित्त किसी पदार्थ में आसक्त होता है।
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भिक्षाजीवी रहते हुए अनेक परीषह या उपसर्ग आते हैं परंतु प्रज्ञा शास्त्रज्ञ एवं समदर्शी साधक आसंयम से विरत होकर आत्मा की रक्षा करता हुआ विचरण करता है।भिक्षा करते समय उसे आक्रोश,वध,अलाभ क्षुध,पिपासा आदि कई परीक्षणों का सामना करना पड़ता है किंतु वह प्रतिकूल परिस्थिति में व्यथित नहीं होता है और ना अनुकूल परिस्थिति में हर्षित होता है समभावपूर्वक सब कुछ सहन करता है।
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