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Yamuna Nagar News: सरकारी स्कूलों में सुविधाओं का अभाव, दांव पर लगी बच्चों की सुरक्षा
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जगाधरी। सरकारी स्कूलों में विद्यार्थियों की संख्या बढ़ा शिक्षकों के लिए टेढ़ी खीर साबित हो रहा है। चूंकि जिले के सरकारी स्कूलों की व्यवस्था ठीक नहीं है। जिस कारण स्कूलों में विद्यार्थियों को न सुविधा मिल पा रही है और न ही सुरक्षा मिल पा रही है। दाखिलों के लिए शिक्षकों के प्रयास व्यवस्थाओं के सामने बेमानी व झूठे साबित हो रहे हैं। चूंकि जिले के कई स्कूल सुविधा व सुरक्षा व्यवस्था की उपेक्षा से जूझ रहे हैं। जिस कारण लोग अपने बच्चों को इन स्कूलों में भेजने से डरते हैं। सबसे ज्यादा बुरा हाल ग्रामीण क्षेत्रों के स्कूलों में हैं। यहां पर सुविधाओं का भारी अभाव है और इनसे विद्यार्थियों को रोजाना दो-चार होना पड़ता है। सरकारी स्कूलों में बच्चों को टाट व दरी पर बैठना पड़ता है।
वहीं, सुरक्षा के मामले में भी सरकारी स्कूल सबसे पीछे हैं। कई स्कूलों में चहारदीवारी तक नही हैं। कई स्कूलों के गेट नहीं है तो कई स्कूलों की कक्षाओं दरवाजे टूटे हुए हैं। जिस कारण विद्यार्थियों को भारी परेशानी होती है। हालांकि स्कूल प्रभारी व मुखियाओं को कुछ काम स्वयं से करवाने की अनुमति है। परंतु वे इसमें दिलचस्पी नहीं लेते हैं। जिस कारण स्कूलों के हालात ज्यादा खराब बने हुए हैं।
जिले के प्रतापनगर खंड का बॉम्बेपुर गांव स्कूल के हालात इससे खराब हैं। नेशनल हाई-वे किनारे बने इस स्कूल की चहारदीवारी नहीं है। कक्षाओं के दरवाजे टूटे हुए हैं। खिड़कियां जाम हैं और सुरक्षा के ठोस प्रबंध नहीं है। पहाड़ व जंगल से घरे इस क्षेत्र में कलेसर जंगल से घूमते हुए अकसर जंगली जानवर सड़क पर आ जाते हैं। ऐसे में विद्यार्थी डर के साय में पढ़ने को मजबूर हैं। इसी तहर घाड़ क्षेत्र करीब एक दर्जन स्कूलों में ऐसे ही हालात हैं। जो सरकारी स्कूलों की व्यवस्था बयां कर रहे हैं। इसी तरह नयागांव का प्राइमरी स्कूल ऐसा है, जिसमें कोई कहीं से भी प्रवेश कर सकता है। आसपास खेत हैं और जानवर यहीं पर घूमते रहते हैं। स्कूल की चहारदीवारी खस्ता हाल है। एक तरफ नई दीवार बनाई गई है, लेकिन दूसरी तरफ की दीवारों से ईंटे तक बाहर आ रही हैं।
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बता दें कि जिले में कुल 592 प्राथमिक पाठशालाएं, 275 माध्यमिक और 111 उच्च व वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालय हैं। इनमें कुछेक माध्यमिक को छोड़ अन्य सभी में डेस्क हैं। जबकि ग्रामीण क्षेत्रों की प्राथमिक पाठशालाओं में बच्चों के लिए बैठने के लिए डेस्क की कमी है। इसके लिए पिछले साल सभी स्कूलों से डिमांड मांगी जा चुकी है। बता दें कि सरकारी स्कूलों में डेस्क देने के लिए शिक्षा विभाग व सरकार की ओर से पायलट प्रोजेक्ट चलाया गया था। जिसके पहले चरण में जगाधरी खंड को कवर किया गया था। इसके बाद दूसरे चरण में अन्य खंडों में डेस्क पहुंचाए गए थे। परंतु सभी स्कूलों में इसकी व्यवस्था नहीं हो पाई। वहीं, विभाग का कहना है कि प्राथमिक पाठशालाओं में विभिन्न गतिविधियां करवाई जाती हैं। एफएलएन के कार्यक्रम के चलते बच्चों को जमीन पर बैठाया जाता है, ताकि वे यह गतिविधियां आसानी से कर सकें। पहली से तीसरी कक्षा में यह गतिविधियां प्रदेश की शिक्षा प्रणाली का हिस्सा हैं।
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बच्चों की सुरक्षा सबसे जरूरी
अभिभावक राजकुमार, रजनी, मुकेश, विजय कुमार, प्रमोद, नितिन, ममता ने कहा कि स्कूलों में बच्चों की सुरक्षा सबसे ज्यादा जरूरी है। सुरक्षा के अभाव में अभिभावक बच्चों को सरकारी स्कूल भेजने से परहेज करते हैं। हालात ऐसे हैं कि सरकारी स्कूलों में कोई भी कहीं से भी प्रवेश कर सकता है। ऐसी व्यवस्था बच्चों की सुरक्षा पर सवालियां निशान लगाती है। शिक्षक उनके घर आकर बच्चों का दाखिला सरकारी स्कूल में करने के लिए कह रहे हैं, लेकिन सुरक्षा दृष्टि से स्कूल ठीक नहीं हैं। ऐसे में उन्हें बच्चों को सरकारी स्कूल भेजते हुए डर लगता है।
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वर्जन
स्कूलों में व्यवस्थाएं बनाने के लिए मुखियाओं व प्राचार्यों को शक्तियां दी गई हैं। कई स्कूलों की चहारदीवारी नहीं है। इसकी जानकारी मांगी गई है। अधिकारियों से इसका एस्टीमेंट बनाकर देने के आदेश दिए हैं। जल्द यह कमी दूर कर दी जाएगी।
धर्मेंद्र चौधरी, जिला शिक्षा अधिकारी।
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वहीं, सुरक्षा के मामले में भी सरकारी स्कूल सबसे पीछे हैं। कई स्कूलों में चहारदीवारी तक नही हैं। कई स्कूलों के गेट नहीं है तो कई स्कूलों की कक्षाओं दरवाजे टूटे हुए हैं। जिस कारण विद्यार्थियों को भारी परेशानी होती है। हालांकि स्कूल प्रभारी व मुखियाओं को कुछ काम स्वयं से करवाने की अनुमति है। परंतु वे इसमें दिलचस्पी नहीं लेते हैं। जिस कारण स्कूलों के हालात ज्यादा खराब बने हुए हैं।
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जिले के प्रतापनगर खंड का बॉम्बेपुर गांव स्कूल के हालात इससे खराब हैं। नेशनल हाई-वे किनारे बने इस स्कूल की चहारदीवारी नहीं है। कक्षाओं के दरवाजे टूटे हुए हैं। खिड़कियां जाम हैं और सुरक्षा के ठोस प्रबंध नहीं है। पहाड़ व जंगल से घरे इस क्षेत्र में कलेसर जंगल से घूमते हुए अकसर जंगली जानवर सड़क पर आ जाते हैं। ऐसे में विद्यार्थी डर के साय में पढ़ने को मजबूर हैं। इसी तहर घाड़ क्षेत्र करीब एक दर्जन स्कूलों में ऐसे ही हालात हैं। जो सरकारी स्कूलों की व्यवस्था बयां कर रहे हैं। इसी तरह नयागांव का प्राइमरी स्कूल ऐसा है, जिसमें कोई कहीं से भी प्रवेश कर सकता है। आसपास खेत हैं और जानवर यहीं पर घूमते रहते हैं। स्कूल की चहारदीवारी खस्ता हाल है। एक तरफ नई दीवार बनाई गई है, लेकिन दूसरी तरफ की दीवारों से ईंटे तक बाहर आ रही हैं।
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बता दें कि जिले में कुल 592 प्राथमिक पाठशालाएं, 275 माध्यमिक और 111 उच्च व वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालय हैं। इनमें कुछेक माध्यमिक को छोड़ अन्य सभी में डेस्क हैं। जबकि ग्रामीण क्षेत्रों की प्राथमिक पाठशालाओं में बच्चों के लिए बैठने के लिए डेस्क की कमी है। इसके लिए पिछले साल सभी स्कूलों से डिमांड मांगी जा चुकी है। बता दें कि सरकारी स्कूलों में डेस्क देने के लिए शिक्षा विभाग व सरकार की ओर से पायलट प्रोजेक्ट चलाया गया था। जिसके पहले चरण में जगाधरी खंड को कवर किया गया था। इसके बाद दूसरे चरण में अन्य खंडों में डेस्क पहुंचाए गए थे। परंतु सभी स्कूलों में इसकी व्यवस्था नहीं हो पाई। वहीं, विभाग का कहना है कि प्राथमिक पाठशालाओं में विभिन्न गतिविधियां करवाई जाती हैं। एफएलएन के कार्यक्रम के चलते बच्चों को जमीन पर बैठाया जाता है, ताकि वे यह गतिविधियां आसानी से कर सकें। पहली से तीसरी कक्षा में यह गतिविधियां प्रदेश की शिक्षा प्रणाली का हिस्सा हैं।
बच्चों की सुरक्षा सबसे जरूरी
अभिभावक राजकुमार, रजनी, मुकेश, विजय कुमार, प्रमोद, नितिन, ममता ने कहा कि स्कूलों में बच्चों की सुरक्षा सबसे ज्यादा जरूरी है। सुरक्षा के अभाव में अभिभावक बच्चों को सरकारी स्कूल भेजने से परहेज करते हैं। हालात ऐसे हैं कि सरकारी स्कूलों में कोई भी कहीं से भी प्रवेश कर सकता है। ऐसी व्यवस्था बच्चों की सुरक्षा पर सवालियां निशान लगाती है। शिक्षक उनके घर आकर बच्चों का दाखिला सरकारी स्कूल में करने के लिए कह रहे हैं, लेकिन सुरक्षा दृष्टि से स्कूल ठीक नहीं हैं। ऐसे में उन्हें बच्चों को सरकारी स्कूल भेजते हुए डर लगता है।
वर्जन
स्कूलों में व्यवस्थाएं बनाने के लिए मुखियाओं व प्राचार्यों को शक्तियां दी गई हैं। कई स्कूलों की चहारदीवारी नहीं है। इसकी जानकारी मांगी गई है। अधिकारियों से इसका एस्टीमेंट बनाकर देने के आदेश दिए हैं। जल्द यह कमी दूर कर दी जाएगी।
धर्मेंद्र चौधरी, जिला शिक्षा अधिकारी।